Saturday, May 28, 2016

चरित्रहीन/ लघुकथा/डा.नन्दलाल भारती

चरित्रहीन/ लघुकथा
हो गया लंच आदरणीय ?
हो तो गया मान्यवर ।
कोई परेषानी है क्या कुछ उखड़े-उखड़े लग रहे हो।
स्थानान्तरण से बड़ी परेषानी क्या होगी ?घर-परिवार सब दूर हो गया,सात जन्म साथ निभाने वाली भी बच्चे के भविश्य के वजह से दूर है। इन सबसे बड़ी बात चरित्र पर मौन अंगुली परेषान कर रही है। लगता है चरित्र प्रमाण लेना पड़ेगा।
क्या बात कर रहे हैं आदरणीय ?दिषा देने वाला भला दिषाहीन कैसे हो सकता है? पच्चीस साल की नौकरी अब चरित्र प्रमाण की जरूरत। मन दुखाने की बात ना करो यार।
चरित्र पर षंका के अंवारा बादल मड़राने लगे है पहले दिन से ही।
आदरणीय आपके बारे में किसी चरित्रहीन के मन में ऐसे विचार आ सकते है।स्थानान्तरित होकर आयेे हो कोई नये नहीं हो,कम्पनी के बाहर की दुनिया भी आपसे परिचित है। ऐसे विचार क्यों आये,मुझे बताओ ।
लंच के लिये कैंटीन जाने लगा तो मैडम बोली नरोत्तमजी लंच टाइम के बाद ही अन्दर आना।मुझे तो जैसे सांप सूघ गया था परन्तु मैंने वैसा ही किया।
आप जैसा चरित्रवान कौन है,आपके बारे में दुनिया जानती है परन्तु यह तो षोध का विशय बन गया है चरित्रहीन कौन ?
डां नन्दलाल भारती
कवि,कहानीकार,उपन्यासकार
दिनांक 27/04/2016
परिचय
डा.नन्दलाल भारती
कवि,लघुकथाकार,कहानीकार,उपन्यासकार

आम माफिया।लघुकथा/डां नन्दलाल भारती

आम माफिया।लघुकथा/डां नन्दलाल भारती
रक्त के आंसू क्यों,क्या खता हो गयी भाग्यवान ?
खता तो मुझसे हो गयी गुड़िा के पापा।
क्या..............?
हां,छत पर लटक रही आम की डाली से गिनकर चार आम तोड़,यहा मुझसे खता हो गयी।
सरकारी कालोनी,सरकारी निवासी,सरकारी पेड़ खता कैसी ?
मिस्टर एल.नावाकम की घरवाली तो सी.आई.डी.की तरह घर की छानबीन कर गयी और बोली कि मेरी बिना मेरी इजाजत के हाथ कैसे लगाई,आज तक किसीकी हिम्मत नही हुई,तुमने चार आम तोड़ लिये।ऐसे तहकीकात कर रही थी जैसे वो नहीं हम आम आममाफिया हो ।
विभाग सरकारी,सरकारी कोलोनी,सरकारी निवासी,सरकारी सम्पतियां,परिसम्पतियां तो आम के पेड़ किसी की बपौती कैसे हो सकते हैं।
मिसेज नावाकम ऐसे बोल की गयी है जैसे हाथ लगा दी तो खून कर देगी।
भाग्यवान मोती सम्भालोएदफतर जाकर मिस्टर नावाकम से बात कर लूंगा,धर्मानन्द बाबू धर्मपत्नी दिव्या से बोलकर दफतर के लिये निकल पड़े। दफतर जाकर धर्मानन्द बाू मिस्टर नावाकम को फोन पर मिसेज नावाकम की बदतमीजियों से अवगत कराना चाहे पर क्या मिस्टर नावाकम बदतमीजी में घरवाली के बाप निकले। धमकाते हुए बोले पन्द्रह सालों में किसी की एक आम तोड़ने की हिम्मत नहीं हुई तुम्हारी घरवाली ने चार आम तोड़ लिये जबकि तुम्हें ज्वाइन किये तीन महीने भी नही हुए हैं।
मिस्टर नावाकम जितना अधिकार आपका है,उतना ही अधिकार मेरा भी है धर्मानन्द बाबू बोले।
इतना सुनते ही मिस्टर नावाकम आग बबूला होते हुए बोले तुम्हारा अधिकार क्यों और कैसे ? जा जिससे मेरी षिकायत करनी हो करके देख ले। मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।
मिस्टर नावाकम आप तो माफिया का भाशा बोल रहे हो धर्मानन्द बाबू बोले ।
हां बोल तो रहा हूं क्या कर लेगा मिस्टर नावाकम बोले ।
जिस दिन प्रबन्धन की नजर पड़ गयी समझो सरकारी आम के अवैध व्यापार की वैध नीलामी षुरू धर्मानन्द बाबू बोले ।
बस क्या आग में घी पड़ गया आम माफिया मिस्टर एल.नावाकम बोले अब तू फोन रख कहते हुए फोन पटक दिये ।
डां नन्दलाल भारती
कवि,कहानीकार,उपन्यासकार
दिनांक 16/05/2016

हेलमेट।लघुकथा/डां नन्दलाल भारती

हेलमेट।लघुकथा/डां नन्दलाल भारती
दीपा के पापा हाथ खून से सने ?
भाग्यवान घबराओ नहीं मैंने ऐसा कोई गैर कानूनी काम नही किया है।
क्या...............हाथ खून से सना है,कमीज पर खून ,रूमाल खाून से सनी है,जूते पर खून के छींटे,आपके साथ कोई हादसा तो नहीं हुआ,कह रहे हो घबराओनही,सच बताओं नहीं तो मेरी जान निकल जायेगी।
हाथ धो लूं । कपड़े बदलने के बाद बात करें तो कैसा रहेगा ?
नहीं पहले सच ।
हाई वे पर एक एक्सीडेण्ट हुआ था,जीवन-मृत्यू से संघर्शरत् इंसान के साथ इंसान होने का फर्ज निभाया हूं बस................
बहुत अच्छा काम किया दीपा के पापा,दुर्घटनाग्रस्त इंसान की हालत कैसी थी ?
सांस चल रही थी,नाक और सिर से खून की धारा बह रही थी,स्कूटर हाईवे के एक तरफ,हेलमेट हाई वे के दूसरी तरफऔर इंसान हाई वे के बीच में पड़ा हुआ था। हे भगवान रक्षा करना ।
हेलमेट एक तरफ पड़ा हुआ था ?
जी...... मोहतरमां .... आप तो जासूस की तरह तहकीकात कर रही है ।
काष हेलमेट का बेल्ट लगा होता तो दिल दहला देने वाला हादसा ना होता ।
जी मोहतरमा..........बिल्कुल सच कह रही हैं,काष लोग हेलमेट अपनी सुरक्षा के लिये पहनते,पुलिस से बचने के लिये नहीं ।

डां नन्दलाल भारती
कवि,कहानीकार,उपन्यासकार
दिनांक 26/05/2016

Tuesday, April 12, 2016

पिता

सुबह-सुबह हवाईयां ?
कैसी हवाईयां भाई ?
माथे की लकीर चुगली कर रही है।
वाह यार तुम तो लकीरें भी पढ़ने लगे ।
बात क्या है?
पिता के प्यार के दीदार हो गये ।
कैसे भाई तुम्हारे पिता तो हजार कोस दूर बिस्तर पर पड़े हैं।
बाबू पिता तो पिता होते हैं।
मुद्दे की बात बताओ घुमाओ ना भाई हम तुम्हारे जैसे धूल में फूल नहीं ढूंढ सकते ना।
सुबह के छःबज रहे थे,घोर कुहरा और भयावह ठण्ड थी पुत्र काम पर जाने के लिये बाहरी गेट खोला ही था कि वयोबृद्ध पिता आ गये और लड़खड़ाती जुबान में बोले बेटा बबलू तू जा मैं गेट बन्द कर लूंगा।
बेटा बोला पापाजी आप घर में जाइये ठण्ड लग जायेगी।
पिता कांपती आवाज में बोले बेटे तू बाहर जा रहा है मुझे घर में ठण्ड कैसे लग जाएगी कहते हुए तथावस्तु की मुद्रा में हाथ उठा दिये थे।
हां यार पिता तो जमीन है आसमान है और पहाड़ भी औलाद के लिये।

चौकीदार


भिया मैं भी आ गया हूं, तुम्हारे शहर में देवदत ने दूरभाष पर रसूल को बताया।
रसूल कहां आ गये भिया ?
संयन्त्र प्रशासनिक कार्यालय में।
कैसे रसूल ने उत्सुकतापूर्वक पूछा ।
घबराओ नहीं, दण्डित होकर नहीं, मेरा स्थानान्तरण हुआ है।
ठीक है,घर पर आना या चौकीदार गेट पर रसूल बोला ।
देवदत्त बोला समय मिले तो आप भी मिल लेना।
समय कहां है,यहां आकर बहुत व्यस्त हो गया हूं,गाड़ी से चलता हूं,दस लोग सलाम ठोंकते हैं। 
अरे वाह भिया तुम तो चपरासी से चौकीदार क्या हुए जैसे रक्षामन्त्री बन गये।

 

मेहनताना


मैं एकदम अकेली हो गयी हूं कुलभूषण के पापा।
मैं कहां दुकेला हूं भाग्यवान। कुलभूषण तुम्हारे पास है। कैसे अकेली हो ।
तुम्हारे बिना मैं भीड़ में भी अकेली हूं।
क्या बात हैं,बहुत परेशान हो। कुलभूषण कहां है?
थाने गया है।
थाने क्यों ?
पुलिस ने परदेशीपुरा में गाड़ी रोक रखी है।
क्यों निरंकुश पुलिस की मर्जी ।सुरक्षा के नाम पर लूट।
क्या ? कैसी सुरक्षा?
चेकिंग के नाम पर रोक था,सारे पेपर दिखा दिया,इसके बाद भी नहीं छोड़ रहे । बोल रहे है गाड़ी थाने से छूटेगी ।
लो कुलभूषण भी आ गया बात कर लो ।
हां बेटा क्या हुआ।
पापा दो थाने का चक्कर लगाने में रात हो गयी । गाड़ी छुड़ा लाया पर चेकिंग के नाम पर गाड़ी रोकने का मेहनताना रू 1500/- नहीं दिया कुलभूषण रोते हुए बोला ।
बाप रे कैसी आजादी बिना वजह जबरिया मेहनताना।

रिश्वत


बांस जरा देखिये ।
क्या दिखा रहे हो,मन लगा कर काम करो,अभी बहुत कुछ सीखना है,मेरे रिटायरमेण्ट से पहले मिस्टर ?
देख तो लीजिये ।
भुगतान के लिये प्रस्तुत बिल ।
कोई गलती है।
गलती तो है पर हम बराबर के भागीदार है।
क्या कह रहे बाबू ?
वे कर्मचारी जिसने चाय पिलाया था गलत बिल दे प्रस्तुत कर गया।
कैसे ?
अमान्य चिकित्सक के चिकित्सा बिल। नियमानुसार बिल का भुगतान तो नहीं हो सकता।
नहीं होगा बाबू क्यों फिक्र करते हो।
बांस एक बात खुलकर सामने आ गयी, चाय भी अब रिश्वत है।

सजा


अरे वो सुन की फुफकार सुनकर लोग भौंचक्के रह गये। जनाब को तनिक सब्र नहीं हुआ,वे चम्मचों से थाली बजाने लगे। होटल कर्मचारी आया और बोला जनाब मीठी दूं या तीखी दाल ।
साहब -मीठी और गरम दे।
होटल कर्मचारी साहब बहुत गरम है,निरापद दो बड़े चम्मच दाल प्लेट में डालते हुए बोला और दूं ।
साहब चम्मच से दाल मुंह में डालते हुए बोले ठण्डी और बकवास है सारा स्वाद खराब कर दिया।
तथाकथित साहब का निरापद कर्मचारी को खरीखोटी सुनाने से पेट नहीं भरा वे तुरन्त होटल मैनेजर को तलब कर लिये। निरापद की शिकायत करने से भी नहीं चुके जबकि उसकी कोई गलती नहीं थी,सचमुच दाल बहुत गरम थी, डाइनिंग हाल में मशीन से दाल गरम हो रही थी। लोग चटकारे लेकर लंच का लुत्फ उठा रहे थे। जनाब को ना जाने क्यों इतना गुस्सा आ रहा था कि थाली कुछ खाना छोड़कर नवागत साथी के साथ चले गये जबकि जनाब के साथी ने प्लेट चाटकर छोड़ा था।
निरापद उदास दुखी खड़ा था,उसके कंधे पर हाथ रखकर चिन्ता प्रसाद बोले थे बेटा तू अपना काम वफादारी से कर रहा है। तू दूसरे देश में होता तो तुझे इनाम और तथाकथित साहब को दण्ड मिलता थाली में खाना छोड़ने के अपराध में। वह चिन्ता प्रसाद की बात सुनकर खुश हुआ था पर उसकी खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी थी,दूसरे दिन वह निरापद नदारद था।

गार्ड


आप नये आये हैं साहब ?
जी यही मान लीजिये ।
नया नहीं हूं जनाब,विभाग की सेवा में रजत जयन्ती वर्ष पूरा कर चुका हूं। स्थानान्तरित होकर आया हूं आपकी सेवा में।
कहां से आये है साहब ?
विभाग के इंदौर क्षेत्रीय कार्यालय से ।
गुलफाम भी तो इंदौर से आया था। आप तो जानते होंगे।
जानता हूं पहचानता भी हूं पर वो नहीं ।
ऐसे कैसे गुलफाम की याददाश्त सरक गयी।
जनाब हाथ पसारने के दिन गुजर गये,स्वार्थी गुलफाम दौलतमंद अफसर हो गया है ।
मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने वाला गुलफाम प्यून से गार्ड हो गया है। ठीक किसी ने कहा है अधगगरी छलकत जाये,ऐसे ही है गुलफाम।

दायित्वबोध


धन्यवाद देवियों।
सुबह-सुबह,धन्यवाद क्यूं अकारण ?
कारण है देवियों ।
कौन सा कारण ?
गोपनीय को अगोपनीय बनाने का ।
सरप्राइज पार्टी का जिक्र कर रहे हैं ।
सिर्फ कमाल का आइडिया था सम्मान ज्ञापन का,सचमुच धन्यवाद की पात्र है आप दोनों देवियां।
दायित्व था। बरसों साथ काम किये। युवा आये थे बूढें हो गये। वरिष्ठ सहकर्मी के जन्मदिन के बहाने साहब लोगों को बुलाकर नाश्ता करवा दिया बस,धन्यवाद जैसा कुछ तो किया ही नहीं।
यही बस आखें खोलने के लिये काफी है।
क्या ?
जी देवियों काश आप दोनों जैसा दायित्वबोध सभी को होता तो रार,तकरार कोसों दूत होता,अपनी जहां और हसीन हो जाती ।
प्रयास अच्छा लगा धन्यवाद दोनों देवियां साथ बोल उठी ।
जी दोनों देवियों के प्रति आभार ।

इन्तजार


रंजू के पापा क्या हुआ ?
कुछ तो नहीं ।
तबियत तो ठीक है ना। चिन्तित और परेशान तो लग रहे हो क्या बात है?
बहुत कठिन है सड़क पर चलना। कितनी भी सावधानी से चलो खतरा मंडराता ही रहता है।
सुरक्षा ही बचाव है अपनी तरफ से पूरी सावधानी बरतना चाहिये ताकि न अपने को ना दूसरे को क्षति पहुंचे ।
बात तो सोलह आने सच है पर लोग इतनी जल्दी में रहते हैं कि मस्तिष्क काम नहीं करता बस जल्दी और जल्दी।
कोई दुर्घटना तो नहीं हुई ?
हुई तो नहीं हो सकती थी ।सावधानी से गाड़ी नहीं चला रहा होता तो आटोरिक्शा वाला टक्कर मार देता । सिगनल पर अचानक सामने आ गया,मेरे तो पांव फूल गये थे। आटो स्कूली बच्चों से खचाखच भरा हुआ था।
मुंआं आटो वाले ना जाने क्यों जहां जगह मिली वही घुसा देते हैं। किसी के जान की उन्हें जैसे परवाह नहीं रहती।
आटो ड्राइवर की गलती का दण्ड मुझ बेकसूर और बच्चों के मां-बाप को भुगतना पड़ता।
ना जाने क्यों लोग अंधगति से चलते हैं,जानलेवा ओवरटेक करते हैं जैसे कि वे जानते ही नहीं कि घर में नन्हे-मुन्ने,बूढे-मां-बाप,पत्नी और कुटुम्ब परिवार इंतजार कर रहा होता है।

 

गांव की चिन्ता


जनाब कहां से हैं?
जन्मभूमि आजमगढ का एकदम छोटा खांटी गांव और पच्चीस बरसों तक कर्मभूमि इंदौर रही। अब एक और नये शहर में ।
मैं बनारस से लगे हुए बिहार के एक सम्पन्न गांव से हूं। गांव में डेढ़ सौ परिवार है दो सौ इंजीनियर। गांव पच्चास साल से अधिक उम्र के भरोसे चल रहा है । लगता हैं आगामी पच्चीस बरसों में अपना गांव अस्तित्व खो देगा। पढ़े-लिखे ही नहीं अनपढ़ लोग भी अंधाधुंध शहर की ओर पलायन कर रहे है।
भारत गांवों में बसता है परन्तु जब गांव नही होंगे तो देश का क्या होगा?
चिन्ता की बात है जनाब। पलायन को रोजगार की कमी ओर जातिवाद बढावा दे रहे है।
भारतीय गांवों को राजनैतिक और धार्मिक सत्ताधीश बचा सकते हैं।
वो कैसे जनाब ?
गांवों में समुचित रोजगार के साधन उपलब्ध करवाकर और सामाजिक समानता स्थापित का ईमानदारी पूर्वक प्रयास करें,तभी भारत के गौरव गांवों को बचाया जा सकता है।
राजनैतिक और धार्मिक सत्ताधीशों को गांवों को बचाने के लिये इतना तो करना ही चाहिये।

औलाद बनाम बे-औलाद


दो साल का विदेशी दौरा से,मुबारक हो साहब दिवाकर बोले।
धन्यवाद प्रभाकर साहब कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बोले।
कैसे आना हुआ साहब,हमें बुला लिये होते ?
नो ड्यूज सर्टिफिकेट चाहिये।
सर्टिफिकेट  अभी बन जायेगा साहब ।
बना तो दोगे पर विभाग के आकाओं की दूरदृष्टि घास चरने गयी है। विभाग की सेवा में जीवन बिता जा रहा है। दस तरह के नो ड्यूज के लिये चक्कर लगाओ। क्या व्यवस्था है?
साहब आप भी आकाओं में से एक है,बदलाव करवा लीजिये मनमाफिक। कई बार विदेश जा चुके है,कोई दिक्कत हुई क्या ? विदेश के दो साल के प्रवास के दौरान पच्चास लाख की कमाई कम तो नही। यहां तो जिन्दगी भर में इतनी नहीं,आप तो नसीब वाले है।
वक्त नहीं हैं नो ड्यूज प्रमाण पत्र बना दो,हर विभाग से नो ड्यूज लेना है।
पांच मिनट की मोहल्लत प्लीज ।
ओके प्रभाकर साहब बोले ।
दिवाकर भाई नो ड्यूज सर्टिफिकेट थमाते हुए बोले साहब पैरेण्टस् के मेकिडकल इंश्योरेंस रिन्यूवल का चेक दे दिये?
पैरेण्टस्  का मेकिडकल  इंश्योरेंस रिन्यूवल नहीं करवाना है मुझे प्रभाकर साहब बेअदबी से बोले।
क्यों साहब ?
पच्चासी साल की मां नब्बे साल का बाप गोलियां खाते रहेगे क्या ?
जनरल मैनेजर प्रभाकर साहब का मां-बाप के प्रति दुराचार देखकर दिवाकरभाई सिर धुन लिये। इतने में गंगाभाई प्यून झट से बोला हे भगवान ऐसी औलाद से तो बे-औलाद बेहत्तर था। प्रभाकर साहब जल्दी से अगली केबिन में घुस गये ।

 

बे-अदब


बे-अदबी भरे अंदाज में मेरे मेडिकल बिलों का भुगतान कब होगा अफसर?
आप श्रीमान् ?
ओह अपना परिचय नहीं दिया.........मैं मेहतवाड़ा ।
कब का बिल है सम्बन्धित अफसर पूछा बैठा ।
नवम्बर महीने से पेण्डिग पड़ा है। तुम लोग क्या काम करते हो ?
देखिये जनाब आपके बिल में कोई खामी होगी,इतने दिनों तक बिल तो लम्बित नहीं रहता। मैं अभी जनवरी में ज्वाइन किया हूं, सीनियर अफसर से बात कर भुगतान करवाने की प्रयास करूंगा अफसर ने अनुरोध भरे अंदाज में कहा ।
तुम जनवरी से क्या किये हो ?
महोदय हमारे संज्ञान में ये मामला था ही नहीं।
ठीक है तुम्हारे संज्ञान में लाता हूं धमकी भरे अंदाज में मि. मेहतवाड़ा बोलते हुए चले गये।
अफसर ने जब वरिष्ठ अफसर बात किया तो ज्ञात हुआ कि बिल में खामियां ही खामियां है, वरिष्ठ अधिकारी रिटायर हो गये परन्तु बे-अदब मि. मेहतवाड़ा लम्बित भुगतान के बारे में कभी जिक्र ही नहीं किये।

 

मैत्रीभाव


सुबह के लगभग साढ़े सात बज रहे थे। टाउनशिप अभी अलसाई हुई थी। खग-विहग जश्न में डूबे हुए थे। मैं शहर में नया था, ऊपर से डयूटी सुबह साढे आठ से शाम साढे पांच बजे तक। उपर से  अहिन्दी भाषी क्षेत्र दूसरे मेल-मिलाप के लिये वक्त नदारद अर्थात सूर्योदय के साथ रवानगी सूर्यास्त के साथ वापसी। टाउनशि में साइकिल पर सब्जी सब्जी वाला भईया तनिक पहचान गया था। वह मैटाडोर से सब्जी उतारकर साफ-सफाई में मशगूल था। मार्निंगवाक् से मैं सीधे ठीहे पर पहुंच गया। बेगैर किसी भूमिका के पाव भर परवल, पाव भर कुंदरू, पाव भर भिण्डी और धनिया मिर्चा का आर्डर दे दिया। भइया मेरी तरफ मुड़ा और बोला बाबूजी आप।
जी भाईजान मैं।
बाबूजी चलो मैं आता हूं। आज तो आठ बजे जाना नहीं है। रविवार है, आज कैसी जल्दी सब्जीवाला भईया बोला।
भाईजान, रविवार तो है पर घर में काम अधिक है कहते हुए मैं र्क्वाटर की ओर चल पड़ा ।
पाव भर परवल,पाव भर कुंदरू, पाव भर भिण्डी, धनिया मिर्च के साथ फूलगोभी भी सब्जीवाला भईया ले आया।
इतनी सब्जी का क्या करूंगा भाईजान ।
बहनजी अभी तक नहीं आयी सब्जीवाला बोला।
नहीं ।
क्यों ?
क्योंकि वहां बेटा पढ़ रहा है।
कब तक और पढेगा ?
तीन साल और । मैं जा रहा हूं।
सब्जीवाला भईया उत्सुकता वश बोला बहनजी को लेने।
नहीं मैं पुनः बोला।
वह उदासी भरे स्वर में बोला बाबूजी आपको बहुत तकलीफ होती होगी ?
बेटे के भविष्य के लिये तकलीफ कैसी भईया ?
बहनजी को बोलना सब्जीवाला कहकर रास्ता नापने लगा।
मैं अवाक् था मैत्रीभाव के रिश्ते पर परदेस में।
--

डां नन्दलाल भारती MA(Socialogy) LLB(Hons) PG Diploma in HRD 
विद्यासागर एवं वाचस्पति सम्मानोपाधि
    Address- Azad Deep- 15-M veena Nagar,Indore(MP)452010 http;//www.nandlalbharati.blog.co.in/ http://www. nandlalbharati.blogspot.com http:// www.hindisahityasarovar.blogspot.com/<http://www.hindisahityasarovar.blogspot.com/>  httpp://www.nlbharatilaghukatha.blogspot.com
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Friday, January 1, 2016

लजाया हुआ मुंह/लघुकथा

लजाया हुआ मुंह/लघुकथा 
धोखु प्रसाद खुद को जातीय सर्वश्रेष्ठ साबित करते नहीं अघाते थे परन्तु मन से गिध्द   थे।रूढ़िवादिता और अन्धविश्वास का आतंक फैलाकर छलना ,ठगना और कमजोर की छाती पर बैठकर फैन फैलाना खानदानी पेशा था । बदले युग में भी जातीय बदलाव तो नहीं था परन्तु मतलबी मौका कहा छोड़ते है दूसरो का हक़ भी छीन लेते है ऐसे थे धोखु प्रसाद । धोखु प्रसाद सरकारी सेवक थे परन्तु वे खुद को सेवक मानने  में शर्म महसूस करते थे। एक दिन हंसी के छींटे मारते हुए दफ्तर के सोफे में धंसते हुए बोले राजू -तुम्हारा साहब तो जा रहा है। 
राजू -दो साल नौकरी के बचे है ऐसे में स्थानांतरण । 
धोखु प्रसाद-तू नहीं समझेगा है तो ठस बुध्दि । 
हाँ श्रीमान तभी  चपरासी हूँ आप जैसा नहीं बन पाया ?
धोखु प्रसाद-बुरा मान गया । 
राजू -नहीं श्रीमान बुरा क्यों मानूँ ,आप तो युगो से आशीर्वाद  देते आ रहे है। 
धोखु प्रसाद-यही अपना पुश्तैनी काम है । 
राजू -होगा ?
धोखु प्रसाद-बिग बॉस का स्थानांतरण नहीं तुम्हारे साहब से मेरा मतलब टाइपिस्ट से था जिसके इशारे पर नाचते रहते हो ।
राजू-स्थानांतरण नहीं । वे खुद जा रहे है। 
धोखू प्रसाद -तेरा क्या होगा राजू ?
राजू -नौकरी खा जाना ?
धोखू प्रसाद -कैसी टेढ़ी बात कर रहा है तू  ?
राजू बोला -बोलने की तमीज नहीं,उपदेश दे रहे हो ।  बीस साल से कभी अपने हेड क्वार्टर पर रहे नहीं,स्थायी निवास पर रहकर टेलीफ़ोन से नौकरी कर रहे हो,साल में लाखो के यात्रा भत्ता,मुख्यालय का फर्जी किराया और भी ढेर सारी सुविधाओं का उपभोग कर विभाग को धोखा दे रहे हो जीजाजी के  भरोसे । हमें कह रहे हो तुम्हारा क्या होगा ? धोखू प्रसाद सोफे से उठे और लजाया हुआ मुंह लेकर दफ्तर बाहर से  निकल गए ।  
डॉ नन्द लाल भारती 
31 दिस 2015  

Friday, November 20, 2015

नरपिशाच/लघुकथा

नरपिशाच/लघुकथा 
देवकी चाची-बहू आपरेशन की  तारीख डाक्टर ने दे दी क्या ?
गीता-आपरेशन कराना ज़िन्दगी से खिलवाड़ है। 
देवकी चाची दूसरे डाक्टर की सलाह ले ली होती,पहले भी चार-चार ऑपेरशन हो चुके है।बार-बार घाव पक रहा है ।  आजकल डाक्टरों पर आँख बंद कर भरोसा करना मौत के मुंह में खुद को धकेलना है। 
गीता- दिखा दी । 
देवकी चाची-किसको ?
गीता-फैमिली डाक्टर को। 
देवकी चाची-क्या आपरेशन जरुरी है क्या कहा डाक्टर साहेब  ने ?
गीता-फैमिली डाक्टर ने एक सप्ताह की दवाई दिया है,दो दिन में मवाद बंद हो गया है,दर्द भी बहुत कम हो गया है। आपरेशन जरुरी नहीं  है। डाक्टर ने दवा गलत दिया था ताकि घाव सूखे नहीं शरीर सूजा रहे ताकि मजबूर होकर आपरेशन करवाना पड़े। 
देवकी चाची-मतलब कमाई के लिए मरीज का वध । 
गीता -यही समझ लो चाची,ज़िन्दगी भर के लिए एक डाक्टर का दिया दर्द पीकर अपाहिज सी ज़िन्दगी जी  रही हूँ। 
देवकी चाची-बदलते समय में आँख बंद कर एक डाक्टर पर  विश्वास करना अपने जीवन से खिलवाड़ करना  है क्योंकि भ्रष्ट्राचार और अवैध कमाई की ललक में  कुछ  डाक्टर -भगवान से नरपिशाच बन गए  है | 
डॉ नन्द लाल भारती
21 .11 .2015










Thursday, November 19, 2015

मृत्युभोज/लघुकथा

मृत्युभोज/लघुकथा 
लौट आये …?
भाग्यवान लौटने के लिए ही गया था ?
नाराज क्यों हो रहे हो ?
तुमसे नाराजगी  कैसी  ?
खाना खाकर आये हो की नहीं  ?
जी बिल्कुल नहीं। 
क्यों खाना अच्छा नहीं था। 
भाग्यवान तेरहवीं के खाने में क्या अच्छा देखना ?
खाए क्यों नहीं ?
कोई पहचानने वाला नहीं था। खाना तो बहुत अच्छा था,ऊपर से बुफे था,वहाँ तो लग ही नहीं रहा था तेरहवीं का भोज है।
तेरहवीं का भोज वह भी बुफे,क्या बात कर रहे हो जी ?
जी मुझे तो लगा ही नहीं कि एक बेटा बाप की तेरहवीं कर रहा है। लग रहा था स्वरुचि भोज का आयोजन है। 
आधुनिक समाज कहाँ जा रहा है एक तरफ मृत्युभोज बंद करने की पहल हो रही है ,दूसरी तरफ बुफे ?
डॉ नन्द लाल भारती
16 .11 .2015

Monday, October 5, 2015

खबर /लघुकथा

खबर  /लघुकथा 
व्हाटएप्प्स से खबर लगी है कि तुम्हारा एक्सीडेंट हो गया है। 
जी सही खबर   है। शुक्र है फ्रैक्चर नहीं हुआ है,शरीर के ढांचे में दर्दनाक अंदरुनी घाव है। आप मित्रो की दुआओ से जान बच गई है। 
क्या कह रहे हो ?
सच कह रहा हूँ कोई बेवकूफ सड़क पर कार का दरवाजा खोल दे तो क्या होगा ?
यार सुनकर रूह काँप उठी। ना जाने लोगो को कौन सी जल्दी रहती है कि राह चलते लोगो की जान लेने पर तूले रहते है। 
हेलमेट से काफी राहत हो गयी बचाव हो  पर पूरा अस्थि पंजर हिल गया है, पूरे  बदन  में भयावह दर्द है भाई। 
मुसीबत टल गयी। दवा लो,आराम करो दर्द भी ठीक हो जायेगा। 
वही हो रहा है,पर  आप मित्रजनों -स्वजनों की दुआ अधिक असरकारी है। 
वह कैसे बुध्दनाथ ?
मौत जो छूकर चली गयी विजय बाबू।  
डॉ नन्द लाल भारती
23 .09 .2015

Friday, September 18, 2015

सुनामी /लघुकथा

सुनामी /लघुकथा 
रोहनबाबू ड्योढ़ी के बाहर जूता निकाल कर पाँव रगड़ते हुए कमरे में दाखिल होते ही कुर्सी में अंदर तक धंस गये.रोहनबाबू को चिंतित देखकर  धन्वन्ति सिर पर हाथ फिराते हुए पूछ बैठी - करन के पापा दफ्तर में किसी से कुछ कहा सुनी हो गयी क्या ?
नहीं भागवान । 
फिर ये सौत का आतंक क्यों ?
कैसी सौत ?
आपकी चिंता किसी सौत से कम है क्या ? चिंता का कारण  क्या है प्राणनाथ ?
एक महिला । 
कहाँ गयी बदचलन औरत ?
कालोनी के नुक्कड़ पर । 
कहाँ की थी ?
आसपास की के किसी कालोनी की रही होगी । यह  महिला  चिंता का कारण कैसे हो गयी ।  कालोनी का प्रवेश अतिक्रमण का शिकार है,दबंगो का कब्ज़ा है। मुख्य सड़क सकरी गली जैसी हो गयी है| सुबह शाम जाम लग जाता है| अभी यही हाल था । अपनी गाड़ी एक तरफ किनारे खड़ी थी । एक महिला एक्टिवा से   आयी मेरी गाड़ी में टक्कर मार दी ,इसके बाद भी मेरे ऊपर चिल्लाने लगी,अंधे हो क्या ,अपनी औकात में रहा करो और ना जाने क्या ?
हमने बोला मैडम खड़ी गाड़ी में टक्कर मार दिया,हजारो का मेरा नुकशान कर  दिया,यह तो वही हाल हुआ उलटा चोर कोतवाल को डांटे | इतना सुनते ही मोहतरमा  द्रुतगति से भाग निकली। 
मिठाई की दुकान वाला मोदक तौलते हुए बोला बाप रे औरत है कि सुनामी।
धन्वन्ति बोली-चिंता छोडो करन के पापा सुनामी निकल गयी|ॉ
डॉ नन्द लाल भारती
18.09 .2015

Sunday, September 6, 2015

निरुत्तर /लघुकथा

निरुत्तर /लघुकथा 
लम्बा टीका और शरीर पर गेरुआ वस्त्र लपेटे ज्योतिषी ने अपनी कई भविष्य वाणियों को सत्य साबित कर विश्वास की पकड़ मजबूत बनाये जा रहे थे। इसी बीच एक व्यक्ति ने नाम के साथ उपनाम लगाये जाने के मुद्दे पर सवाल कर दिया। ज्योतिषी सवाल के जबाब में बोले उपनाम व्यक्ति कुल वंश और गोत्र के परिचायक होते है ।
दूसरा व्यक्ति बोला गलत । 
तीसरा बोला व्यक्ति के स्व अभिमान और अन्धविश्वास को बढ़ावा है और कुछ नहीं । उपनाम का चलन ख़त्म चाहिए । 
ज्योतिषी बोले क्या ज़माना आ गया है लोग कुल वंश को ख़त्म करना चाहते है ।
चौथा व्यक्ति बोला ज्योतिषी महोदय मत नाराज होइए, सोचिये और श्री कृष्णा का यादव उपनाम नहीं था श्री राम जिन्हे मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है उनका उपनाम सिंह नहीं था । उपनाम का दौर व्यक्ति के स्व अभिमान और अन्धविश्वास को बढ़ावा नहीं तो और क्या है ……?
निरुत्तर तथाकथित ज्योतिषी ने बस्ता समेट कर नौ दो ग्यारह हो लिए |
डॉ नन्द लाल भारती
06 .09 .2015

जय-जयकार /लघुकथा

जय-जयकार /लघुकथा 
पंद्रह अगस्त के जश्न के सुअवसर पर आयोजित वक्तव्य कार्यक्रम में गेरुआ धोती, कुर्ता और टोपीधारी   प्रथम वक्ता अपने वक्तव्य की शुरुआत कर्मकांडी श्लोको से कर  आज़ादी का  सेहरा हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वंय सेवक के सिर पर बाँध कर गौरान्वित महसूर कर रहे  थे परन्तु बेखबर  श्रोता जैसे कानो  में  अंगुली डाले बैठे थे । इस चुप को तोड़ते हुए उच्चवर्णिक जर्नलिस्ट  कन्या ताल ठोकते हुए  बोली वक्ता महोदय आज़ादी की जंग   पूरे भारत ने जाति धर्म से ऊपर उठकर लड़ी थी तभी देश आज़ाद हो पाया वरना देश का क्या हाल होता ? वक्ता  महोदय आपका कथन आज़ादी के दीवानो अमर शहीदो का अपमान है।सर्वधर्म और समभाव को आहत करता है], बहुत हो गया अब जाति-धर्म के नाम पर बंटवारा ,आज की  युवा पीढ़ी बहकावे में नहीं आने वाली है, आज की पीढ़ी को   समतावादी समाज और सर्व संपन्न देश चाहिए जाति धर्म के नाम जहर उगलता  भेदभाव  नहीं । इतना सुनते ही जर्नलिस्ट कन्या की जय-जयकार होने लगी।   डॉ नन्द लाल भारती
26.08.2015

Sunday, August 23, 2015

आधुनिक भिखारी/लघुकथा

आधुनिक भिखारी/लघुकथा 
हेलो अंकल ....... अंकल …हेलो आंटी … हेलो आंटी … बार की आवाज़ सुनकर बबलू सिर खुजलाते हुए बाहरी गेट की ओर बढ़ा। 
बबलू को देखकर आगंतुक नवयुवक बोला हेलो ब्रदर। 
बबलू-बोलिये क्या काम है? मम्मी यज्ञ-हवन कर रही है ,पापा ध्यान । 
नवयुवक-घर क्या ये तो मंदिर हो गया ?
बबलू-पापा छत्तीस करोड़ देवी- देवता में विश्वास नहीं करते,मम्मी कर लेती है । आपको पापा से काम है या मम्मी से ?
अब तो आपसे ही है ब्रदर ।
क्या मतलब बबलू चमक कर बोला ?
अरे ब्रदर घबरा क्यों रहे हो आज नागपंचमी है ।
तो मै करुँ ?
कुछ दान कर दो नवयुवक बोला ।
पढ़े लिखे होकर भीख मांग रहे हो,कुछ तो शर्म करो ?
ब्रदर -पूजा पाठ करना, दान लेना पुश्तैनी काम है नवयुवक बोला ।
अपात्र भिखारी को दान देना पाप है और कानूनी जुर्म भी ।
इतने में नयन बाबू बोले कौन है बबलू बेटा ?
बबलू गेट बंद करते हुए बोला आधुनिक भिखारी ।
डॉ नन्द लाल भारती 20 .08 .2015

Tuesday, July 28, 2015

दर्शन /लघुकथा

दर्शन /लघुकथा 
बाबा बहुत थके मांदे लग रहे हो,कहाँ से आ रहे हो  ?
बेटा  दर्शन करने गया था। 
कब से जा रहे हो बाबा ?
बचपन से। 
दर्शन कभी हुआ ?
किसी को नहीं हुआ तो हमें कहाँ होगा ?
बाबा मेहनत की कमाई क्यों बर्बाद कर रहे हो ?पुजारियों को घुस देते हो ,चढ़ावा चढ़ाते हो ,दानपेटी में भी डालते हो,वी आई पी दर्शन भी कर लेते हो ,इसके बाद भी कह रहे दर्शन नहीं हुए। बाबा होगे भी नहीं। 
क्या कह रहे हो बेटा। 
बाबा जरा सोचो। 
क्या .........? 
पत्थर की मूर्ति,लोहे का दरवाजा,हट्टे -कट्टे  पूजापाठ करवाने वाले  वंशागत  ठेकेदार ,क्या ऐसी कैद में भगवान के दर्शन हो सकते है बाबा ?
तुम्ही बताओ बेटा ।
बाबा जातिपाति की रार से ऊपर उठकर  दीन-दुखियो की सेवा करो,भूखो को रोटी ,वस्त्रहीन को वस्त्र दो, यही ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि है,इनकी सेवा  ईश्वर की पूजा  है।  
बेटा तुमने तो मेरी आँख खोल दी। अब दीन-दुखियो की आँखों में ईश्वर के दर्शन करूँगा। 
बाबा जरूर होगा। डॉ नन्द लाल भारती 04 .07.2015  

नाक /लघुकथा

नाक /लघुकथा 
पिता को दिन प्रतिदिन चिंता की चिता में सुलगता देखकर नयना  हिम्मत जुटा कर पिता से पूछ बैठी। पिताजी आपकी चिंता का कारण कही मैं तो नहीं ?
बेटी  क्यूँ  और कैसी चिंता ?भला चिंता का कारण तू क्यों हो सकती है बेटा ? 
ब्याह के  दहेज़ की चिंता पिताजी । 
कौन करेगा मैं नहीं करूँगा तो । सुयोग जाति पूत वर मिल जाता है तो तेरी डोली उठाकर सीधे गंगा स्नानं को जाऊँगा । 
ब्याह से ज्यादा दहेज़ दानव की चिंता है ना  ? पिताजी एक एहसान कर दीजिये मुझ पर । 
कैसा एहसान बेटा ?
जाति पूत को सौंप कर गंगा स्नान की जिद का पिताजी । 
ज्यादा पढ़-लिख गयी तो अपने बाप की नाक कटवायेगी क्या ?
खूंटे से  बंधी गाय नहीं ……नाक और ऊँची होगी पापा । 
कैसे  ऊँची होगी ?
उच्च शिक्षित अमीर चतुर्थ वर्णिक लडके से ब्याह कर । 
घोर कलयुग आ गया प्रथम वर्णिक लड़की चतुर्थ वर्णिक लडके से ब्याह । 
हां पापा नयना  बोली।  
ना बेटी ना ऐसा अधर्म ना करना । 
पापा इससे दो समस्याओ का अंत होगा  । 
कौन सी समस्या का अंत करने जा रही है ।
पापा..........दहेज़ दानव और जातिवाद का । 
आख़िरकार नयना अपने मकसद में कामयाब हो गयी । ब्याह के दिन  स्व-रूचि भोज का आनंद लेते हुए लोग बड़े चाव से चबा -चबा कर बतिया रहे थे ,लो जी वह दिन भी आ गया दीवार खड़ी करने वाले ही  तोड़ने लगे। अब तो  देश की नाक दुनिया में ऊँची हो जाएगी ।  
डॉ नन्द लाल भारती 16 .07.2015

खतरा /लघुकथा


खतरा /लघुकथा 
रौद्र एंव शांत चित का प्रयास,क्या कोई मनभेद तो नहीं ?
अरे भई अपनी जहां में तो तिलकधारी जैसे लोग मनभेद लेकर ही पैदा होते है । ऐसे मनभेदी देश समाज के लिए कैंसर बने हुए है। 
तिलकधारी ने क्या विष बो दिया ?
तिलक की आड़ में ज्ञानी महापुरुष ही नहीं महागुरु भी बन रहां है।  
कौन सा विष बाण छोड़ दिया आज  ?
कहता  ज़िन्दगी में कभी सीखने की कोशिश नहीं करोगे क्या ?
ढकोसलेबाज में इतनी समझदारी आ गयी क्या ?
हाँ, ऐसे ही बहुरुपिया  समझदारो ने  तो ज्ञान-विज्ञानं को फेल कर देश और आधुनिक शिक्षित समाज को भ्रमित कर रखा है ।  
ढकोसलेबाज रूढ़िवादियों के परित्याग में ही देश का विकास ,सामाजिक समानता और सदभावना निहित है । 
ढोंगी रूढ़िवादी  तिलकधारी लोकहित और परमार्थ से कोसो दूर हो गए  है,स्वार्थ और गुनाह के नज़दीक आ गए है,समाज को खंडित-विखंडित कर अपनी सत्ता स्थापित करने में आज भी कामयाब है  चिंताप्रसाद । 
सच ऐसे लोग ही देश और सभ्य समाज के लिए खतरा है नेकचन्द । 
 डॉ नन्द लाल भारती 11 .07.2015
  

Thursday, June 25, 2015

भईया का बर्थडे/लघुकथा

भईया का बर्थडे/लघुकथा 
दिनेश हांफते हुए अरे अंकल... ?
क्या हुआ बेटा ... ?
आपके पडोसी गोभल ....... 
क्या हुआ मिलावटखोर,बेईमान,भ्रष्ट्राचारी  गोभल को,कही वो भी तो आत्महत्या नहीं कर लिया अपने दूसरे परिजनों की तरह ,दिनेश की हड़बड़ाहट देखकर नरेंद्र बाबू के माथे की लकीरे तन गयी  । वह बुत से खड़े रह गए। 
अंकल क्या सोच रहे हो बाहर निकालो ,आपके घर तक तांता लगा हुआ है दिनेश एक सांस में बोल गया । 
नरेंद्र बाबू बाहर निकले ,भीड़ से एक लडके को इशारे से बुलाये । माथे से पसीना पोंछते हुए पूछे बेटा इतनी भीड़ क्यूँ  सुबह सुबह । 
अंकल आप नहीं जानते ?
क्या नहीं जानता बताओ तो सही बेटा  । 
भईया का बर्थडे है । 
कौन से भईया ....... ?
भोलू………………। 
तीन दिन पहले बाप बेटे की महाभारत  हो रही थी,आज बर्थडे मनाने के लिए इतनी भीड़ । कहा खो गए अंकल ?भोलू भईया पार्टी के जुझारू नेता है ,शहर के  हर वार्ड के बड़े नेता आये है भईया का बर्थडे मनाने के लिए । 
ये वही भोलू है जो मिडिल की परीक्षा नहीं पास कर पाया ,पिछले साल लड़की भगा कर ले गया था ,गली गली मारा मारा फिरता था । हाय रे  राजनीति की  तरक्की । इतने में भोलू भईया ज़िंदाबाद के नारे गूँजने लगे। नरेंद्र बाबू दोनों हाथॉ  से कान दबाये अंदर चले गए और दिनेश अपने घर की ओर  । 
 डॉ नन्द लाल भारती 26 .06 . 2015  

Wednesday, June 24, 2015

श्रद्धांजलि /लघुकथा

श्रद्धांजलि /लघुकथा 
दफ्तर तुम्हारे नाम है क्या ?
ऐसी कौन सी गुस्ताखी हो गयी कि इतनी बेरुखी वह भी फ़ोन पर ?
भगवान के फ्यूनरल में नहीं गए ?
घर से तो जाने के लिए आया था । 
गए क्यों नहीं ?
दफ्तर पहुंचा तो पता चला की साहब लोग निकल गए ।
बात नहीं हुई थी ।
बिग बॉस से साढ़े नौ बजे बात हुई थी ,नहाने जाने का कहकर फ़ोन बंद कर दिए थे ।
आई सी ।
व्हाट………
उच्च अधिकारियो के बीच तुम कैसे …………?तुम तो दफ्तर से ही श्रद्धांजलि दे दो |
मैं सुबह से ही भगवान की आत्मा की शांति और उसके परिवार के सुखद जीवन के लिए भगवान से प्रार्थना कर रहा हूँ ।
तुम्हारी श्रद्धांजलि जरूर कबूल होगी । जानते हो…………?
क्या ?
उच्च अधिकारियो की बातो पर विश्वास मत किया करो ।
क्यों …………?
हंसिया अपनी तरफ खींचता है मिस्टर नगीना ।
डॉ नन्द लाल भारती 24 .06 . 2015

टेढ़े मत चला करो /लघुकथा

टेढ़े मत चला करो /लघुकथा 
मिस्टर कोढ़े अपने घर के सामने  बाइक और एक्टिवा खड़ी देखकर अपने से दस साल बड़े पडोसी मिस्टर सदानंद से रौद्र रूप में पूछे  ये तुम्हारी है क्या ?
कार निकल जाए हटा लेंगे, मिस्टर सदानंद बोले ॥  
मिस्टर कोढ़े का रौद्र रूप और विकराल हो गया,वे गरजते हुए बोले इतना टेढ़े मत चला करो । 
मिस्टर सदानंद इतनी बदतमीजी और बेरुखी क्यूँ भाई  ? बाइक और एक्टिवा सड़क पर खड़ी है ,गैरेज से कार बाहर करने के बाद अंदर करेंगे ,इतनी असभयता का नंगा प्रदर्शन क्यों  ?
हम लोग तुम लोगो से ज्यादा सभ्य है मिस्टर कोढ़े बोले । 
हां वो तो है ,लोग दूर से समझ जा रहे होगे । 
आग में घी मत डालो मिस्टर कोढ़े पुनः बोले । 
आग में घी क्यों  प्रत्यक्ष प्रमाण है । 
कौन सा.…………?
मिस्टर कोढ़े आपका पांच फ़ीट असंवैधानिक बारजा,असंवैधानिक  खिड़की जो मेरी तरफ खुली है ,असंवैधानिक फुटपाथ जिसका निकास हमारी तरफ है ,असंवैधानिक  ट्यूबवेल  जो फूटपाथ के नीचे है ,और तो और हमारे यहाँ सब के पास यूनिवर्सिटी की डिग्री है आपके पास चरवाहा विश्वविद्यालय की और कुछ आपके सभ्य और उच्च श्रेणी के होने का प्रमाण दू क्या  सदानंद बोले ? 
इतना सुनते ही मिस्टर कोढे लजाया हुआ भाल लिए  अपने असंवैधानिक किले में चले गए  और स्वाभिमान से सदानंद दफ्तर। 
डॉ नन्द लाल भारती 24 .06 . 2015