Wednesday, January 29, 2014

कैसा भेद /लघुकथा

कैसा भेद /लघुकथा
श्रमवीर ये कैसा भेद ?
किस भेद की बात  कर रहे हो दरविंदर ?
दलित और पददलित के भेद का ।
रोज देख रहे हो ,सुन रहे हो ,पत्थराई आँखों का  दर्द ,नहीं समझ सके आज तक ।
क्या  और कहाँ ?
आसपास,दफ्तर,  बूढ़े समाज में।
आसपास से मतलब आपके साथ भी ।
हम कहाँ अलग है ,सच है प्यारे। अहित की साजिश ,अपमान,भेदभाव ,अवमूल्यन दलित  जीवन के रिसते दर्द हैं। पददलित होने पर गुंजाईश रहती है। दलित के साथ पद दलित पर सम्भावनाये और अधिक बढ़ जाती है शोषण उत्पीड़न दमन की ।
यानि चौतरफा दर्द।
हां दरविंदर ,यही दलित और देश का दुर्भाग्य है।
श्रमवीर बाबू  ये भेद तो क़त्ल है सभ्य मानव समाज और देश की आत्मा का।  
 डॉ नन्द लाल भारती 30 .01  .201४ 

Tuesday, January 28, 2014

मौन ,उदासी और सवाल /लघुकथा

मौन ,उदासी और  सवाल /लघुकथा
स्थांतरण और रिटायरमेंट के बीस साल बाद फ़रिश्ते की तरह अचानक प्रगट हुए देखकर कर्मवीर पांव छूटे हुए पूछा अस्लाम साहब। ……?
अस्लाम साहब-पहचान लिए कर्मवीर ,कैसे हो माय ब्वाय ?
बहुत बढ़िया  साहब . इतने में पूरा दफ्तर इकट्ठा हो गया, और सबने अस्लाम साहब को पलको पर बिठा लिया। अपने अधीनस्थ ज्वाइन किये कर्मचारियो को उच्च पदो पर देख कर खुश हुए। कर्मवीर से मुखातिब होते हुए पूछे  कर्मवीर तुम ?
कर्मवीर से सवाल छीन कर दूसरे अधिकारी बोले इसका भी प्रमोशन हो गया है।
अस्लाम साहब -योगयता को देखते हुए तो बहुत आगे कर्मवीर को जाना था।
कर्मवीर आपक ही डायलॉग है साहब -ये इण्डिया है प्यारे यहाँ बहुत सी बातों का फर्क पड़ता है। इस अंडरटेकिंग कंपनी में उसी  फर्क ने  मेरे कैरिअर का क़त्ल किया है। मसलन -ऊँची जाती उंच पहुँच और ये दोनों योगयताए मेरे पास नहीं है। इसी अयोग्यता के कारण मैं आगे नहीं जा सका।
कर्मवीर की पीड़ा सुनकर अस्लाम साहब के माथे पर मौन,उदासी और सवाल की तड़ित रिसने लगी थी।
डॉ नन्द लाल भारती 28 .01  .201४ 



Friday, December 27, 2013

धृतराष्ट्र/लघुकथा

 धृतराष्ट्र/लघुकथा
कल क्यों नहीं आये।
कहाँ ....?
ड्यूटी पर।
छुट्टी थी कल ।
आने को कहा था मै और दूसरे अधिकारी भी आये थे .
बॉस पेट्रोल रूपये लीटर है ,जीवन के पल अनमोल है क्यों बिना किसी मूल्य के बेकार करता .
मतलब दूसरे लोग लूट रहे हैं .
सिर्फ स्व-जातीय और दोनों हाथो से। मै का मालिक इसमे शामिल नहीं।
क्या …?
बॉस कलयुग के  धृतराष्ट्र ना बनिए ।
डॉ नन्द लाल भारती 28 .12 .2013

रिश्वत /लघुकथा

 रिश्वत /लघुकथा
दादा पांव लांगू 
 तरक्की करो बेटवा . सौतेली माँ सब लूट कर मायका भर दी क़म से माँ अब से भगवान सुन लेते . विदेश कब जा रहे हो बेटा । 
दादा छः महीने के बाद शायद। 
क्यों क्या हुआ बेटा। 
मेडिकल फिर से होगा। 
क्यों … ।
दिल्ली का पानी नहीं पचा ।
मतलब जुकाम हो गया था . डॉ को रिश्वत नहीं दिया ,नरभक्षी ने फेल कर दिया य़े नरभक्षी किस्म के लोग गरीबो का भविष्य कब तक तबाह करते रहेगे। .
हां दादा फेल हो गया .पास  होने की कीमत पंद्रह सौ रूपया थी  बाद में पता चला ।
 बेटवा गरीब की आह बेकार नहीं जायेगी।
डॉ नन्द लाल भारती 28  . 12  . 2013

Friday, November 29, 2013

आशीर्वाद /लघुकथा

आशीर्वाद /लघुकथा
पापा नेताजी जीताओ मित्र मंडल के सदस्य आये थे।
क्या फरमान लाये थे।
नेताजी अपने घर आने वाले है आज।
कोई  लालच देने क्या ? पांच साल तक तो दूर -दूर तक नहीं दिखाई पड़े अब घर। वाह रे वोट की लीला नेताजी घर आ रहे गरीब के।
पापा नेताजी जीताओ मित्र मंडल के सदस्य फूलमाला दे गए है।
 वाह क्या खूब …? नेताजी खुद के अभिनन्दन के लिए फूलमाला तक का बंदोबस्त एडवांस में करवा दिए है
शहीदो की आत्माएं विलाप कर रही होगी ऐसे लोकतंत्र की सिपाहियो को देखकर।   देश और जन हित का क्या काम करेगे ऐसे   आशीर्वाद लेने वाले स्वार्थी  नेता।  
डॉ नन्द लाल भारती   29 . 11. 2013

श्रध्दांजलि /लघुकथा

श्रध्दांजलि /लघुकथा
अरे सुनती हो भागवान।
क्या सुना रहे हो। तुम्हारी सुन-सुन कर अब तो कान सवाल-जबाब करने लगे है.,सुनाओ सुन रही हूँ।
भागवान ललित  गुप्ताजी चल बसे।
क्या,कब कैसे ………?बेचारे जवान बेटे कि मौत का गम ढोते-ढोते  लगता है थक गए थे। बेटी केरलवासी हो गए। गुप्ता आंटी का क्या होगा ?
 भगवान  जो चाहे। अफ़सोस मुट्ठी भर माटी नहीं दे पाये।  बेचारे अपनी मुसीबत में कितने काम आये थे।
याद है ,भगवान् भले मानुष की आत्मा को शांति बख्शना और गुप्ता आंटी को आत्मबल।
हमारे पूरे परिवार कि ओर  से  भईया ललित गुप्ता को श्रध्दांजलि कहते हुए श्याम बाबू और उनका पूरा परिवार दो मिनट के लिएय मौन साध गया। डॉ नन्द लाल भारती   29 . 11. 2013

Wednesday, November 13, 2013

पागल आदमी/लघुकथा

पागल आदमी/लघुकथा
रंजू के पापा दफ्तर से आ रहे हो ना…… ?
कोई शक  भागवान ………?
शक कर नरक में जाना है क्या। ....?
हुलिया तो ऐसी ही लग रही है जैसे पागल कुत्ता पीछे पड़ा था।
कयास तो ठीक है।
कहाँ मिल गया।
वही जहां  उम्र का मधुमास पतझड़ हो गया।
मतलब।
दफ्तर में।
मजाक के मूड में हो क्या …?
नहीं असलियत बयान कर रहा  हूँ। तीन दिन -रात एक कर दफ्तर शिफ्ट करवाया।  उच्च अधिकारी छुट्टी पर या दौरे पर चले गए।  मजदूरी और गाड़ी के  भाड़े  का भुगतान मुझे ही करना पड़ा जेब से उसी  भुगतान पर अपयश लग गया।
ईमानदारी और वफादारी पर अपयश ?
जी भागवान छोटा होने का दंड मिलता रहां है। इसी  भेद ने उम्र का मधुमास पतझड़ बना दिया।
अपयश कैसे लग सकता है।
लग गया भागवान।
कौन लगा दिया।
वही पागल आदमी जो उच्च ओहदेदार बनने के लिए दो खानदानो की इज्जत दाव पर लगा दिया  अब पद के मद में पागल कुता हो रहां है।
रंजू के पापा पद के मद में पागल आदमी हो या पागल कुत्ता दोनो  की मौत भयावह होती है। संतोष रखिये  ।
डॉ नन्द लाल भारती   14. 11. 2013