Thursday, February 13, 2014

हकभक्षी /लघुकथा

हकभक्षी /लघुकथा
क्यों चिन्ता ग्रस्त हो ?
दो पांव वाले जानवर हकभक्षी हो।
कर्म और भगवान् पर विश्वास रखो
कर्म तो ठीक है। कौन से   भगवान जो हथियारो से लैस है। अपनी रक्षा के लिए भागे भागे फिरते है क्या उनको आंसू पीने वालो का दर्द नहीं दिखाई देता।
क्यों नास्तिक हो रहे हो ?
हक़भक्षी ,कर्मकांडी ,रूढ़िवादी भेदभाव का नस्तर मारने से बढ़िया तो नास्तिक होना ही है।
ईश्वरीय सत्ता को क्यों चुनौती दे रहे हो ?
चुनौती नहीं  आडम्बर का  विरोध,जो आडम्बरो का विरोध किये है वही  नरोत्तम हुए और।
और क्या ?
जो भेदभाव का नस्तर मारे है ,रूढ़िवाद -जातिवाद का पोषण किये है वे हकभक्षी …………
डॉ नन्द लाल भारती

Thursday, January 30, 2014

डील/ लघुकथा

डील/ लघुकथा
हेलो  खूंखार आवाज़ से  सहम उठा।
कहा है जनाब ?
छुट्टी पर जा रहा हूँ ,लौटते ही दौरे पर आता हूँ . दो चार गवाह तैयार  रखना ,बयान बदलवाना है या एनकाउंटर।
जैसा चाहेगे वैसा हो जायेगा।
इसी में हम दोनों की भलाई है।
जी समझ गया।
पास की सीट पर बैठा युवक धीरे  से बोला अंकल पुलिस  वाले अंकल डॉन लगते है , कैसी डील कर रहे है  खचाखच भरी ट्रेन में।
हां बेटा यही लोग तो  है तो अपराधी ,नक्सलवादी और आतंकवादी बनाने की मशीन है।
डॉ नन्द लाल भारती १५,01.२०१४ 

वृक्षभक्षी /लघुकथा

वृक्षभक्षी /लघुकथा
बहुत उदास हो भौजाई क्या बात हो गयी ,गाव  की याद आ रहे है।
गाव  कैसे भूल सकता है।  जड़े तो वही है।
उदासी का कारण  .......?
देखो।
क्या ....... ?
ये बादाम का पेड़ कटवा दिया।  ठूँठ पर अगरबत्ती लगाकर आंसू बहा रही है।
कटवायी नहीं, बलिदान दिया गया है।
ये कौन सी मन्नत थी।
पडोसी …?
पडोसी को कौन सा नुक्सान हो रहा था ,फायदा ही था शुध्द ताजी हवा मिल रही थी।पेड़ के फायदे का मूल्यांकनकितना भी करो कम होता है ।
 उसकी हवेली ढँक रही थी पेड़ से।  पता उसकी तरफ गिरता था तो लगता था उसकी छाती पर पहाड़ टूट पड़ा हो कलह से बचने के लिए बादाम का  बलिदान दे दिया ।
एक पेड़ सौ पुत्र सामान ,पडोसी नहीं समझा ,पडोसी है  या वृक्षभक्षी।
 डॉ नन्द लाल भारती  12.01.2014


Wednesday, January 29, 2014

कैसा भेद /लघुकथा

कैसा भेद /लघुकथा
श्रमवीर ये कैसा भेद ?
किस भेद की बात  कर रहे हो दरविंदर ?
दलित और पददलित के भेद का ।
रोज देख रहे हो ,सुन रहे हो ,पत्थराई आँखों का  दर्द ,नहीं समझ सके आज तक ।
क्या  और कहाँ ?
आसपास,दफ्तर,  बूढ़े समाज में।
आसपास से मतलब आपके साथ भी ।
हम कहाँ अलग है ,सच है प्यारे। अहित की साजिश ,अपमान,भेदभाव ,अवमूल्यन दलित  जीवन के रिसते दर्द हैं। पददलित होने पर गुंजाईश रहती है। दलित के साथ पद दलित पर सम्भावनाये और अधिक बढ़ जाती है शोषण उत्पीड़न दमन की ।
यानि चौतरफा दर्द।
हां दरविंदर ,यही दलित और देश का दुर्भाग्य है।
श्रमवीर बाबू  ये भेद तो क़त्ल है सभ्य मानव समाज और देश की आत्मा का।  
 डॉ नन्द लाल भारती 30 .01  .201४ 

Tuesday, January 28, 2014

मौन ,उदासी और सवाल /लघुकथा

मौन ,उदासी और  सवाल /लघुकथा
स्थांतरण और रिटायरमेंट के बीस साल बाद फ़रिश्ते की तरह अचानक प्रगट हुए देखकर कर्मवीर पांव छूटे हुए पूछा अस्लाम साहब। ……?
अस्लाम साहब-पहचान लिए कर्मवीर ,कैसे हो माय ब्वाय ?
बहुत बढ़िया  साहब . इतने में पूरा दफ्तर इकट्ठा हो गया, और सबने अस्लाम साहब को पलको पर बिठा लिया। अपने अधीनस्थ ज्वाइन किये कर्मचारियो को उच्च पदो पर देख कर खुश हुए। कर्मवीर से मुखातिब होते हुए पूछे  कर्मवीर तुम ?
कर्मवीर से सवाल छीन कर दूसरे अधिकारी बोले इसका भी प्रमोशन हो गया है।
अस्लाम साहब -योगयता को देखते हुए तो बहुत आगे कर्मवीर को जाना था।
कर्मवीर आपक ही डायलॉग है साहब -ये इण्डिया है प्यारे यहाँ बहुत सी बातों का फर्क पड़ता है। इस अंडरटेकिंग कंपनी में उसी  फर्क ने  मेरे कैरिअर का क़त्ल किया है। मसलन -ऊँची जाती उंच पहुँच और ये दोनों योगयताए मेरे पास नहीं है। इसी अयोग्यता के कारण मैं आगे नहीं जा सका।
कर्मवीर की पीड़ा सुनकर अस्लाम साहब के माथे पर मौन,उदासी और सवाल की तड़ित रिसने लगी थी।
डॉ नन्द लाल भारती 28 .01  .201४ 



Friday, December 27, 2013

धृतराष्ट्र/लघुकथा

 धृतराष्ट्र/लघुकथा
कल क्यों नहीं आये।
कहाँ ....?
ड्यूटी पर।
छुट्टी थी कल ।
आने को कहा था मै और दूसरे अधिकारी भी आये थे .
बॉस पेट्रोल रूपये लीटर है ,जीवन के पल अनमोल है क्यों बिना किसी मूल्य के बेकार करता .
मतलब दूसरे लोग लूट रहे हैं .
सिर्फ स्व-जातीय और दोनों हाथो से। मै का मालिक इसमे शामिल नहीं।
क्या …?
बॉस कलयुग के  धृतराष्ट्र ना बनिए ।
डॉ नन्द लाल भारती 28 .12 .2013

रिश्वत /लघुकथा

 रिश्वत /लघुकथा
दादा पांव लांगू 
 तरक्की करो बेटवा . सौतेली माँ सब लूट कर मायका भर दी क़म से माँ अब से भगवान सुन लेते . विदेश कब जा रहे हो बेटा । 
दादा छः महीने के बाद शायद। 
क्यों क्या हुआ बेटा। 
मेडिकल फिर से होगा। 
क्यों … ।
दिल्ली का पानी नहीं पचा ।
मतलब जुकाम हो गया था . डॉ को रिश्वत नहीं दिया ,नरभक्षी ने फेल कर दिया य़े नरभक्षी किस्म के लोग गरीबो का भविष्य कब तक तबाह करते रहेगे। .
हां दादा फेल हो गया .पास  होने की कीमत पंद्रह सौ रूपया थी  बाद में पता चला ।
 बेटवा गरीब की आह बेकार नहीं जायेगी।
डॉ नन्द लाल भारती 28  . 12  . 2013