Saturday, July 12, 2014

पर्दाफाश /लघुकथा

पर्दाफाश /लघुकथा
देहात की प्रसूता की जान को बचाने के लिए ए पॉजिटिव  खून की तुरंत जरुरत है की उड़ती खबर सुनकर अमन प्रदेश के सबसे बड़े निजी अस्पताल, जो शहर से २५ किमी दूर था,जिसके मालिक चिकित्सा शिक्षा के फर्जीवाड़ा के केस में कई महीनो से जेल में है की और भागा। अमन को प्रसूता के सगे सम्बन्धी मुख्य द्वार पर मिल गए,जबकि अमन से  किसी प्रकार की कोई जान -पहचान ना थी । वे लोग अमन को पलको पर बिठा कर अस्पताल के लैब में ले गए ।अमन को देखते ही डॉ बोला जाओ कैंटीन से कुछ खा कर आओ
अमन - डॉ साहेब मैं घर से खाकर आ रहा हूँ आप तो तुरंत खून लेकर प्रसूता की जान बचाईये

डॉ -वह हो जायेगा पर कैंटीन से कुछ खा कर आओ
।आखिरकार अमन को जबरदस्ती अस्पताल की कैंटीन में भेज दिया गया ,जहां उससे फूल डिनर का भुगतान भी  लिया गया ।डिनर का बिल चुकाने के बाद अमन का खून लिया गया । ब्लड डोनेट कर देने दे बाद अमन को बीस रुपये का कूपन दिया गया  और कहा गया जाओ कैंटीन में कुछ पी लो
अमन बोला -डॉ यही कूपन पहले दे देते
। डिनर का रूपया तो मेरा बच जाता । कैसा रॉकेट चल रहा है डॉ ………?
प्रसूता का पति गिड़गिड़ाते हए बोला मेरी पत्नी और बच्चे को बचा लो डॉ साहेब
डॉ-कैश काउंटर से  रसीद लेकर आओ प्रसूता का पति रसीद दिखाते हुए बोला रसीद है मेरे पास साहेब।
डॉ -सचमुच गावड़े हो। अरे खून के  कीमत की रसीद।
प्रसूता का पति का  बाप बोला डॉ साहेब ये दान का खून है इसकी  कीमत।
डॉ-यहां कुछ मुफ्त का नहीं है।
आखिरकार प्रसूता के सगे   सम्बन्धियों ने मिलकर अपने अपने पॉकेट की निङ्गा झोरी कर रूपये जमा करवाये तब जाकर खून चढ़ाने की प्रक्रिया पूरी हुईप्रसूता के  बाप अमन के सिर  पर हाथ रखा कर बोले बेटा युग-युग जीओ]खूब तरक्की करो ,परमार्थ का काम तो कर ही रहे हो।  मेरी बेटी और उसके बच्चे का जान बचाने के लिए हमारा परिवार तुम्हारा कर्जदार रहेगा बेटा ।
अमन-बाबा मुझे बहुत दुःख है। प्रसूता  के   बाप कैसा दुःख बेटा ?
अमन -डोनेशन के खून की मुंह माँगी कीमत गरीब से वसूली जा रही   है इसका दुःख है बाबा। इस रॉकेट का पर्दाफाश कैसे  और कब होगा ?

डॉ नन्द लाल भारती 13 .07.2014   

Sunday, May 25, 2014

विश्वनाथ दर्शन / लघुकथा

विश्वनाथ दर्शन / लघुकथा
नाना क्या हुआ पंडितजी ने क्यों हाथ पर झपटा मारा है तनु पूछी।
दानपेटी में कुछ रूपया  डाल रहा था वही छीन लिया है पंडितजी ने।
तनु- पंडितजी छिना झपटी क्यों ?
पंडितजी- ये रूपया मंदिर के  जायेगा।
तनु-दानपेटी का रूपया कहा जाता है बतायेगे ?भगवान के  मंदिर में डकैती। नरक जाने की पूरी तैयारी कर बैठे है पंडितजी ? कशी विश्वनाथ बाबा सब देख रहे है।
मेरे नाना परदेस से आये है कशी विश्वनाथ के दर्शन करने क्या यादे दे कर भेज रहे हो ,पंडितजी ने  तो कान में जैसे रुई ठूस लिया।
बेटी ऐसे पंडा पुजारियों के  कारण तो लोग मंदिर जाने में खौफ खाते  है।
तनु- हां नाना बिलकुल ठीक कह रहे है इसीलिए तो हम लोग बनारस में रहकर भी नहीं आये  ,पहली बार आपके साथ आये तो देखो पंडितजी ने छिना -झपटी कर लिया। नाना मंदिर में भगवन के दर्शन की बजाय घर मंदिर ज्यादा बेहत्तर है। नाना बनारस के  ही संतशिरोमणी  रविदास ने कहा है मन चंगा तो कठौती में गंगा। 
हां बेटी बात तो सही है पर आस्था तो मंदिर से जुडी  है न।
तनु-आस्था का ही तो नाजायज फायदा ये लोग उठा रहे है। भगवान के घर में भी तनिक खौफ नहीं इन पंडा पुजारियों को।
हां बेटी भगवन और मंदिर को बपौती समझने वाले इंसान को  ही नहीं भगवान को धोखा देने वाले पंडा -पुजारी नास्तिक बनाने पर तुले हुए है। घर मंदिर ज्यादा बेहत्तर है ।
डॉ नन्द लाल भारती    25 मई2014   

Tuesday, April 22, 2014

लाश की कीमत/ लघुकथा

लाश की कीमत/ लघुकथा
मिसेज दमयंती दमयन्ती पलंग से नीचे पाँव रखते हुए बोली माया कितने दिनों के बाद आ रही हो। बेटी तुमको पता है मेरा घुठना पग-पग पर सवाल करता है।  गायब रहेगी तो मेरा  जैसे हो जायेगा।
माया मेम साहब पांच दिन ही तो हुए है।
मिसेज दमयंती-पांच दिन काम है क्या ? मेरी हलता पर तुझे तरस नहीं आता अगर मैं भी तुम्हारे जैसे करने लगी तो तुम्हारे हाथ क्या आएगा फिर  अपना रोना रोयेगी ,मुझे इमोशनल ब्लैक करेगी . जानती है तेरे पति में ऐब है तो छोड़ साले को रोज-रोज नरक की जिंदगी से छुटकारा पा ले ,बच्चो को पढ़ा -लिखा रही है,जितनी तेरी इनकम है तो अपने और बच्चो पर तो अच्छी ज़िन्दगी बिता सकती है। फिर तेरा पैसा छीन कर मारा पीटा है ना। जा फ्रिज में दूध है हल्दी डालकर गर्म करके एक गिलास पी ले।
माया नहीं मेम साहेब लफंडू लठैत मार नहीं है पैसा गहन सब बेच दिया है। एक नयी मुसीबत सिर  पर आ गयी है।
दमयंती-वह क्या .............?
माया -सासू।
मिसेज दमयंती-खबरदार सासु माँ को मुसीबत कही तो। सासू को अपनी माँ  समझो। माँ बाप धरती के भगवान होते है। उनकी सेवा करो खूब आशीर्वाद दुआ बटोरो।
माया- वही तो कर रही हूँ। गॉव की जमींन  बिक गयी पति का लात मुक्का खाकर बचाई अपनी कमाई डूब गयी फिर भी बुढ़िया वेल्टीलेटर से चिपकी है। डाक्टर ढाई  मांग रहा आपरेशन करने के लिए।
मिसेज दमयंती-क्या कह रही हो वेल्टीलेटर पर तुम्हारी सासु माँ है।
माया-जी मेम साहब।
मिसेज दमयंती-कब से।
माया- सप्ताह भर से।
मिसेज दमयंती-कही लांस की कीमत रो अस्पताल वाले नहीं वसूल रहे।
माया- काया कह रही है मेम साहेब।
मिसेज दमयंती-कौन से अस्पताल में  भर्ती है।
माया -सर्बिन्दो।
मिसेज दमयंती-डाक्टर विनोद खंडारी का अस्पताल है। देश और देश के भविष्य का दुश्मन है ये डाक्टर मेडिकल चिकित्सा परीक्षा घोटाला का मास्टर माइन्ड है। अभी जेल में है जानती हो ना।
माया -दुनिया जानती है ये तो।
मिसेज दमयंती-बेटी काम छोडो अस्पताल जाओ अपने पति से बोलो रूपये का इंतजाम हो गया है। वह डाक्टर से पक्का कर ले आपरेशन के बाद सासु माँ ठीक तो हो जाएगी। डाक्टर बोले हां तो बोलना मुझे गारंटी चाहिए।
माया मिसेज दमयंती- के बताये अनुसार अस्पताल गयी और अपने पति के सामने मिसेज दमयंती की कही बात तोते जैसे दोहरा दी। उसके पति की आज अपनी घरवाली की स्मझदृ पर गुमान हो आया वह भी डाक्टर के पास गया और अपनी घरवाली की कही बात तोते जैसे दोहरा दिया बस क्या आनन -फानन में डाक्टरों ने माया की सासु माँ को घंटे भर में मृत घोषित कर दिया जो सप्ताह भर पहले मर चुकी थी जिसे अस्पताल वाले लाश  की कीमत वसूलने के लिए वेल्टीलेटर पर ज़िंदा कर रखे थे। डॉ नन्द लाल भारती    22  अप्रैल 2014

Friday, April 4, 2014

जय -विजय /लघुकथा

जय -विजय /लघुकथा
कब  रिटायर हो रहे हो परवेश ?
 दर्द से मन नहीं भरा क्या ?  अब रिटायर करने की  जल्दी  सामंतो  ?
भला हमें  जल्दी क्यों होगी ?
किसी उच्च-स्व-जातीय रिश्तेदार को नौकरी मिलने की  ।
क्यों बोली से गोली मार रहे हो ?
हकीकत तो यही है ना  सामंतो . कितने षणयंत्र रचे गए फिर भी नौकरी पर काबिज हूँ
नौकरी से बेदखल  तो नहीं हुए ना।
योग्यता और संविधान के भरोसे टिका हूँ रिसते  जख्म  के दर्द पीकर अर्ध शासकीय नौकरी में।
जनरल मैनेजर नहीं बन पाने का मलाल तो होगा .
मलाल तो रहेगा। जातिवाद के पोषक दमनकारी आदमियत के दुश्मन ,योग्यता के बलात्कारियो का चक्रव्यूह तोड़ने में और वक्त लगेगा।
तब तक तुम्हारी कई पीढ़िया गल जायेगी परवेश।
सामंतो याद रखो इतिहास गवाह है दमनकारियों का नाश हुआ है।  भले ही मुझे  आगे नही बढ़ने दिया ,नित नए जख्म दिए ,झराझर आंसू दिए,बार -बार हार दिए हौशलापस्त नहीं हुआ पर जय-विजय हमारी ही हुई है परवेश गर्व से बोला।
सामंतो -सतयमेव जयते।
डॉ नन्द लाल भारती
   04
अप्रैल 2014

बाहरी /लघुकथा

बाहरी /लघुकथा
अटेन्डेन्ट -सर आप तो एकदम बाहरी हो गए।
कैसी  बात कर रहे हो लालू ?
आपके लिए दरवाजा बंद हो गया।
मुझ अदने के लिए तो विभाग का दरवाजा पहले से ही बंद है। तुम कौन से दरवाजे की बात कर रहे हो ?
सामने वाले की ,जिधर से एसी की हवा आ रही थी अ लपलपाती लू में आप तो पक जाओगे कच्ची केरी की तरह।
लालू जिसकी लाठी उसकी भैंस। मिस्टर अफसर को हर अघोषित लाभ और सुविधा का अघोषित अधिकार स्वजातीय बिग बॉस ने दे रखा है। मिस्टर अफसर दोनों हाथो से लूट रहे है। हमारा तो विभाग में कोइ गाड  फादर नहीं है इसलिए हमारी तबाही निश्चित है और हो रही है। हमें तो लाभ की तरफ देखना भी मना है। लालू हम तो पहले से बाहरी है और अब और अधिक हो गए।
लालू -सर आप भी तो अफसर है ?समझ गया।
क्या समझ गया लालू  ?
आप  उच्च जातीय गुट में फिट नहीं बैठते ना इसलिए बदनाम और चौतरफा नुकशान किया जा रहा है। किसी ने सच कहा है अंधा बांटे रेवड़ी अपने-अपने को देय। सर आपका अब निडर और बाहरी बने रहना ही उचित लगता है।
सलाह के लिए धन्यवाद लालू।
डॉ नन्द लाल भारती
   04
अप्रैल 2014






दहकती लू का दिया दर्द/लघुकथा

दहकती लू का दिया दर्द/लघुकथा
नारायण क्या खबर है ,खुश  हो ना ?
स जी सब बढ़िया है।  रही खुश नाराज होने की बात तो ,मेरे नाराज और खुश होने से क्या फर्क पड़ता है. जैसे पहे जैसे ही जी रहा हूँ दर्द का बोझ छाती पर लादे त्या साहेब।
कितने अफसर आये -गए कई तो साधारण ग्रेजुएट थे बिग बॉस हो गए तुम तो बहुत अधिक पढ़े लिखे योग्य हो। तुम्हारे साथ अत्याचार क्यों। …?
नारायण साहेब छोटी कौम का होने  का दंड मिल रहा है। यह विभाग हमारे जैसो के लिए नहीं बना है। इस विभाग में ऊपर जाने के लिए पहली योग्यता ऊँची जाति फिर ऊँची पहुँच।
सत्या -वाह रे शाइनिंग इंडिया कब तक शोषितो की तरक्की  कागजी घोडा बनी रहेगी।
नारायण देख रहे हैं शाइनिंग इंडिया की  स्वर्णिम आभा में दहकती लू का दिया दर्द भोग रहा हूँ। क्या यही तरक्की है....... …?
डॉ नन्द लाल भारती    04 अप्रैल 2014

Wednesday, April 2, 2014

संतोष की जड़/लघुकथा

संतोष की  जड़/लघुकथा
बुध्देश्वर आतंकित  क्यों कौन सी डर तुमको खाये जा रही है।
सिध्देश्वर क्यों न डर  लगे  वहाँ  जहां सामंतवाद- वंशवाद को  प्रोत्साहन और दमित का  दमन हो रहा हो ।
अभी तक सामंतवादी अफसरशाही का मन परिवर्तन नहीं हुआ क्या ?
कैसे कहूँ मेरे साथ तो कुछ अच्छा  नहीं हुआ जीवन के बावन वसंत तो बित चुके . आधे से अधिक कंपनी की  सेवा में पर आज भी वही दर्जा। लोगो का व्यवहार तो हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और है।
समझ गया तभी सामंतवादी प्रबंधन ने योग्यतानुसार पदोन्नति से वंचित हाशिये का आदमी बना कर रखा है । देख लिया  सुन और समझ भी लिया।
कैसे सिध्देश्वर   ?
दफ़तर की ड्योढ़ी चढ़ते ही वैसे भी सामंतवादी जहर की तासिर से वाकिब हूँ। बबूल के पेड़ की छांव होती है दमितों के लिए सामंतवादी हुकूमत और वही अभी यहाँ लागू है।कंपनी  के उद्देश्य समभाव के तो है पर सामंतवादी विषबेल रोप रखे है जिसकी वजह से तुम कराहे जा रहे हो।
सामंतवाद का  दर्द  अब  बर्दाश्त नहीं होता पर करे क्या ?
रावण को भी इस जहां से   रो-रो कर जाना  पड़ा है,विज्ञानं के युग में विष बो कर कब तक भय पैदा करेगे सामंतवादी। प्यारे    तुम्हारी चिंता जायज है पर तुम अपनी शक्ति का सम्मान करो बुध्देश्वर।
वही कर रहा हूँ तभी तो अस्तित्व है वरना ये  दमनकर्ता  नेस्तानाबूत कर दिए होते सिध्देश्वरबाबू
कलम में बहुत शक्ति है.टिके रहो संतोष की  जड़ पाताल जाती है बुध्देश्वर।
डॉ नन्द लाल भारती
   02
अप्रैल 2014