Wednesday, February 11, 2015

ओम की मौत /लघुकथा

ओम की मौत /लघुकथा 
ओम नाम था उसका। हां नशे की तनिक लत थी पर गुस्ताख़ बंदा ना था। परायी नारी में उसे अपनी माँ -बहन नज़र आती थी। इसी नज़र की वजह से पड़ोस me रहने वाली युवा कुंवारी कन्याओ के अनैतिकता की और बढ़ाते कदम को रोंकने की गुस्ताखी करवा दी ।इन कुंवारी कन्याओ ने नारी होने का खूब फायदा uthaya। ओम के खिलाफ अनेक धाराओ में पुलिस केस दर्ज़ करवा दिया। ओम और उसका इज्जतदार परिवार खौफ में रहने लगा। इसी खौफ ने एक दिन नन्हे बच्चो के युवा बाप ओम की जान ले ली। ओम की मौत से उठे सवाल नारी अस्मिता को कठघरे में खडे कर रहे थे और साथ ही सभ्य समाज की छाती में ठोंक रहे थे कीलें भी। डॉ नन्द लाल भारती 20.01.2015

एफ.आई.आर./लघुकथा

एफ.आई.आर./लघुकथा 
मुंशीजी रिपोर्ट लिख लिया …… ?
कौन सी रिपोर्ट हेडसाहेब …… ?
चोरी वाली और कौन सी। 
बिना माल लिए। सब छाप रहे है। हम फोकटी तो नहीं। 
लिखो तो सही। 
देखो हेडसाहेब बिना माल के काम नहीं। 
थाने में पुलिस का आपसी मोलभाव सुनकर कृपणारायण बोला कैसे न्याय मिलेगा धनबीर…… ?
आओ चले धनबीर बोला। 
कहाँ …… ?
कचहरी।
कचहरी क्यों …… ?
मुकदमा दर्ज़ करवाने।
बिना एफ.आई.आर.लिखवाये।
दबे कान आवाज़ सुन रहे हो ,एफ.आई.आर.लिखवाने के माल लगते है ।
ठीक कह रहे हो, थाने में सुनवाई नहीं हो रही है कचहरी में हो सकती है। थाने का सबूत भी तो मोबाइल में हो गया है।
डॉ नन्द लाल भारती
23 दिसम्बर 2014

ओम की मौत /लघुकथा

ओम की मौत /लघुकथा 
ओम नाम था उसका। हां नशे की तनिक लत थी पर गुस्ताख़ बंदा ना था। परायी नारी में उसे अपनी माँ -बहन नज़र आती थी। इसी नज़र की वजह से पड़ोस me रहने वाली युवा कुंवारी कन्याओ के अनैतिकता की और बढ़ाते कदम को रोंकने की गुस्ताखी करवा दी ।इन कुंवारी कन्याओ ने नारी होने का खूब फायदा uthaya। ओम के खिलाफ अनेक धाराओ में पुलिस केस दर्ज़ करवा दिया। ओम और उसका इज्जतदार परिवार खौफ में रहने लगा। इसी खौफ ने एक दिन नन्हे बच्चो के युवा बाप ओम की जान ले ली। ओम की मौत से उठे सवाल नारी अस्मिता को कठघरे में खडे कर रहे थे और साथ ही सभ्य समाज की छाती में ठोंक रहे थे कीलें भी। डॉ नन्द लाल भारती 20.01.2015

Thursday, December 11, 2014

गुरु दक्षिणा/लघुकथा

गुरु दक्षिणा/लघुकथा 
सम्मान समारोह बाद एक पत्रकार ने सवाल उछाल दिया । लेखकजी आपके साहित्यिक गुरु कौन है। 
लेखक -मेरे अनपढ़ माँ -बाप और जीवन संघर्ष ?
क्या आपका कोई गुरु नहीं ?
बताया तो। 
इनके अतिरिक्त ?
कोई नहीं।
आप इतना बढ़िया लिखते है, बिना किसी गुरु से साहित्यिक शिक्षा लिए।
माँ -बाप और अपने जीवन संघर्ष से शिक्षा लया हूँ और ले भी रहा हूँ।
आपने गुरु क्यों नहीं बनाया ?
एकलव्य का अंगूठा गुरु दक्षिणा में चला गया याद है मेरा हाथ ही चला जाता तो … ?
डॉ नन्द लाल भारती 12 .12 .2014

Tuesday, December 9, 2014

बेटी का रिश्त/लघुकथा

बेटी का रिश्त/लघुकथा 
आईये पंडित जी।  बहुत खुश लग  रहे है।  कैसा लगा घर -वर ?
घर-वर  ठीक हैं। लड़की का लड़के से सत्ताईस गुण मिल रहे  है। 
बधाई पंडित जी।  ब्याह की तयारी करो। 
तनिक और सोचना पड़ेगा। 
लड़का एम बी ए है ,नौकरी कर रहा है। वर्णिक आरक्षण की भरपूर सुविधा का उपभोग भी मिल रहा  है । अब क्या सोचना पंडित जी। 
और भी अच्छा रिश्ता घर के पास आगरा  से आ रहा है। लड़का बी एस सी है । जूते के  थोक व्यापार का जमा जमाया धंधा  है। रोज लाखो की आवक है। बिटिया सुखी रहेगी। 
क्या कह रहे  हो पंडित जी महाराज कल तो दफ्तर के उच्च वर्णिक सफाई कर्मचारी के नाम पर उल्टी आ रही थी ।धर्म भ्रष्ट ho रहा था ।आज जूता व्यापारी के घर बेटी का रिश्ता…?  
डॉ नन्द लाल भारती 09 .12 .2014  

Monday, December 8, 2014

सजा /लघुकथा

सजा /लघुकथा 
मई की तपती लू का आतंक था। नए नए आये प्रमुख अफसर अवध प्रताप सिंघ का चैम्बर बर्फीला हो रहा था। खैर होता भी क्यों नहीं ऊपर पंखा, खिड़की पर एसी जो टंगा था।अचानक अवध प्रताप सिंघ विद्यांशु को चपरासी रईस के माध्यम से बुलवाये। विद्यांशु हाजिर हुआ। 
प्रमुख अफसर -कब से काम कर रहे हो ?
अट्ठारह साल से। 
एक ही जगह अट्ठारह साल से। 
जी प्रमोशन नहीं हो रहा मै तो चाहता हूँ पर प्रमोशन के साथ ट्रांसफर। विद्यांशु बात आगे बढ़ाते हुए बोला एक अनुरोध है साहब।
क्या अवध प्रताप सिंघ बोले ?
मेरे मरते हुए सपनो को उम्र दे सकते है साहब।
वो कैसे ……?
प्रमोशन के लिए अनुशंसा कर।
इतना सुनते ही साहब को जैसे करैत ने डंस लिया। वे एसी की तरफ मुंह कर बोले क्या किया है।
पीजी के साथ प्रशासन से संबंधित डिग्री डिप्लोमा भी।
तुम्हे प्रमोशन क्यों चाहिये।
नौकरी भविष्य लिए कर रहा हूँ। साहेब सभी के हो रहे है। स्नातक टाइपिस्ट जनरल मैनेजर तक बन गए । ना जाने क्योंमेरे साथ अन्याय हो रहा है ?
शिकायत कर रहे हो प्रबंधन की । आरक्षित वर्ग हो ना।इसीलिए नेतागीरी कर रहे हो
जी आरक्षित वर्ग का तो हूँ नहीं कर रहा हूँ।
नेताजी सुनो मिनट में बाहर करवा सकता हूँ. जानते हो ये विभाग तुम्हारे लोगो के लिए नहीं बना है। अपने लोगो को देखो खाने को अन्न नहीं पहनने को वस्त्र नहीं,आज भी लोग पास खड़े तक नहीं होने देते ।तुम तो दफ्तर में बैठे हो बाबूगिरी कर रहे हो , सर्वसुविधा भोग रहे हो। तुम नसीब वाले हो तुम्हे नौकरी मिल गयी है,तुम्हारे बच्चे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ रहे है. क्या इतनी तरक्की कम है। अवध प्रताप सिंघ नरभक्षी सिंह की तरह दहाड़ते हुए बोले ?
आगरा नरेश नौकरी आप और जैसे सभी कर रहे है पर मुझे शोषित क्यों ? विद्यांशु बोला।
नरभक्षी सिंह की तरह दहाड़ते हुएअवध प्रताप सिंघ साहब बोले छोड़ दो नौकरी सजा लग रही है तो। तुम्हारी सजा का जिम्मेदार कौन है।
आप और आप जैसे सामंतवादी लोग।
डॉ नन्द लाल भारती 04.12 .2014

Saturday, November 1, 2014

इकलौती बहन /लघुकथा

इकलौती बहन /लघुकथा 
गीता,सुरेखा,सुलोचना और मुन्नी आंटी फुटपाथ पर खड़े -खड़े जैसे चारो युगो के  मुद्दो पर  विमर्शरत थी। इसी बीच माध्यम कद-काठी का आदमी विमर्शरत  महिलाओ के सामने सेगुजरा । उस व्यक्ति की ओर अंगुली  दिखाते हुए  सुरेखा बोली -अभी जो आदमी  गया है, उसके चलने के अंदाज से कोई परिचित लग रहा था। 
सुलोचना-दीदी पहले बताती  तो  आगे बढ़ कर पूछ भी लेती अब तो वह आदमी  दूर  निकल गया।
मुन्नी आंटी- लौटने का इन्तजार करना है  क्या ?
सुरेखा-अब वापस लौट कर आने  वाला तोनहीं  है क्या इन्तजार करना।  चलो भजन  में  मिलते है। इसी बीच  गीता ने अपने पड़ोस वाली खडूस सास का मुद्दा उछाल दिया ,मुददा   परत दर परत द्रोपती की  साड़ी हो गया। इसी वह आदमी आता हुआ दिखाई पड  गया, सुलोचना बोली दीदी आपके  चाहने वाले ने दिल की आवाज़ सुन ली है देखो आ रहा है। 
सुरेखा -अरे हां वह पास  आँख फाड़-फाड़ कर निहारने लगी।  इतने में वह आदमी  आ  गया। सुरेखा एकदम उसके आगे खड़ी होकर बोली आप राजसिंघ हो क्या ?
तुम सुरेखा हो क्या  ? राजसिंघ बोला। 
सुरेखा -अंकल आंटी सब ठीक है ?
राजसिंघ- माँ बीमार रहती है पिताजी स्वर्गवासी हो गए। 
सुरेखा -अंकल की मौत का सुनकर बहुत दुःख हो रहा है।
मुन्नी आंटी - जो आया है सबको जाना है ,भगवान उनकी  आत्मा को शान्ति बख्शे। 
सुरेखा -हां आंटी   ठीक  कह रही हो। अच्छा राज भैया नौकरी धंधा कैसा चल रहा है। 
राजसिंघ- सुरेखा बहन हम  चारो भाई सरकारी नौकरी में है ,सब अपने-अपने  बालबच्चों के साथ बंगला गाड़ी और दुनिया की सारी  सुख सुविधाओ  के साथ मजे में है। 
सुरेखा -छुटकी रानी भी तो बालबच्चेदार हो गयी होगी। 
राजसिंघ-रानी अपनी नसीब में शादी का सुख नहीं लिखवा कर लाई है। 
सुरेखा -क्या ?
राजसिंघ-हां बहन। 
सुरेखा - कर्म और फ़र्ज़ को विसार कर नसीब के आसरे बैठ गए तुम चारो।इसी गम अंकल चल बसे आंटी बीमार रहती है क्या ? 
राजसिंघ-क्या करे रानी की नसीब में शादी नहीं लिखी है। 
सुरेखा - वाह रे कलयुग  बाप मेहनत मज़दूरी करके तुम भाई -बहन को उच्ची शिक्षा दिए। आज तुम चारो भाई  दुनिया का हर सुख भोग   रहे हो,इकलौती बहन का ब्याह नसीब पर छोड़ दिए , यह तो तुम चारो    भाइयो के लिए चुल्लू पानी में डूब मरने वाली बात है कहते हुए सुरेखा ने मुंह मोड़ लिया और  राजसिंघ कुछ कदम चलकर कालोनी में समा गया। 
डॉ नन्द लाल भारती 27.10.2014