Tuesday, June 23, 2015

श्रवण और दधीच /लघुकथा

श्रवण और  दधीच /लघुकथा 
सुबह -सुबह चिंता के बादल,क्या वजह है कमल ?
चिंता के  तो है पर अंवारा नहीं गुलाब बाबू | 
शक पुख्ता है । 
पुख्ता ही समझिये । 
वजह क्या है ,क्यों चिंतित हो कमल  ?
गुलाब बाबू जब खून के रिश्ते स्वार्थ की हदें तोड़ने और बेगानो जैसा व्यवहार करने लगे तो चिंता तो  होगी ना ?
क्या खून के रिश्तो में बेगानेपन का जहर ?
हाँ गुलाब बाबू वही अपने खून के रिश्तेदार जो जोंक की तरह अपने लहू पर पल रहे, जिनके सुख-दुःख पर  मेहनत की कमाई स्वाहा हो रही । 
वाकई चिंता की वजह पुख्ता हो गयी है । 
अब तो टूटने लगा हूँ गुलाब बाबू । 
हिम्मत ना  हारो कमल,तुम कितना त्याग कर रहे हो सभी जानते  है।  आदमी नहीं भी माने तो क्या भगवान पर भरोसा रखो। उसी  को साक्षी मानकर  नैतिक दायित्वों का निर्वहन करते रहो बस. चिंता -फिक्र को मारो गोली  । 
कर तो वही रहा हूँ  पर कुफ़्त और दर्द तो होता ही है भले ही मर्द हूँ क्योंकि नशे की जिद के आदी बाप के लिए श्रवण  और स्वार्थी भाई के लिए दधीच नहीं बन सका गुलाब बाबू। 
बनना भी नहीं कमल । 
डॉ नन्द लाल भारती 
18.06. 2015  


Thursday, June 18, 2015

ये कैसा भैयप्पन/लघुकथा

ये कैसा भैयप्पन/लघुकथा 
कुटुंब की तरक्की के लिए,सगे  सम्बन्धियों से दूर शहर का  वनवास झेल रहा बड़ा भाई काफी हद तक अपने मकसद में सफल हो चुका था.गाँव में रह रहे छोटे भाई के बेटे को नन्ही सी उम्र से अपने साथ रखकर पढ़ा लिखाकर अफसर बना लिया  था,बाकि बच्चो का भी पूरा ख्याल रखता ,छोटे भाई उसके परिवार  के हर दुःख -सुख को अपना दुःख सुख समझता था ,बीमा होने पर सहारा लेकर इलाज करवाता था,छोटे भाई के इलाज पर लाखो खर्च कर चूका था जबकि गाँव में छोटा भाई भी स्वरोजगार से था। शहर का  वनवास झेल रहा बड़ा भाई अपनी बेटी के ब्याह को लेकर चिंतित था,काफी भाग दौड़ के बाद सुदूर बेटी की शादी तय हो गयी।  बड़े भाई ने खबर छोटे भाई और निकट के रिश्तेदारो को शादी में शामिल होने का अनुरोध सविनय किया था। सप्ताह भर बाद बड़े भाई ने बेटी के ब्याह में शामिल होने के लिए रेल टिकट की जानकारी लेना चाहा तो छोटे भाई ने कहा हमने अपना और अपने परिवार का टिकट करवा लिया है पर.…?
बड़ा भाई पर का क्या मतलब भाई....... ?
रेल टिकट पर छः हजार खर्च हो गए है,छोटा भाई तगादे के अंदाज में बोला । 
बेटी के ब्याह में आने के लिए खर्च भी देना है , मैं  जिस छोटे भाई के  मोह में कुए का मेढक बना हुआ था उस भाई का  ये कैसा भैयप्पन। बड़े भाई के हाथ से फ़ोन छूट गया,बेचारा बड़ा भाई ठगा सा छाती पर हाथ रखे वही बैठ गया।    
 डॉ नन्द लाल भारती 
29.04.2015     

राज /लघुकथा

राज /लघुकथा 
क्या राज है, मौन खिलखिलाहट का नरेंद्र ?
हाशिये के आदमी की नसीब में कहाँ खिलखिलाहट सतेंद्र बाबू । 
चेहरा मौन खिलखिलाहट की चुगली कर रहा है,कोई ख़ास वजह तो है । 
कोई ख़ास नहीं बस एक मुर्दाखोर की याद आ गयी । 
मुर्दाखोर क्या बक रहे हो नरेंद्र ?
सच सतेंद्र बाबू ।
कौन है वो अमानुष ?
एक था सामंतवादी,शोषतो की नसीब का खूनी विभागीय तुगलक विजय प्रताप । जिसके अघोषित फरमान से हम और हमारे जैसो को तरक्की से दूर बहुत दूर फेंक दिया गया और तो और हम और हमारे के लिए विभाग का दरवजा बंद कर दिया गया सिर्फ जातीय वैमनस्यता के कारण ।
ये तो ख़ुशी की नहीं शर्म की बात है नरेंद्र।
मुर्दाखोरो को कहाँ शर्म आती है सतेंद्र बाबू ? दैवीय चमत्कार ही मानो एक दिन ऐसे मुर्दाखोरो का गुमान टूटता जरूर है ।
अमानुष विजय प्रताप का गुमान कैसे टूटा ?
उसकी औलादों ने मुंह पर जूते पर जूते दे मारा सतेंद्र बाबू ।
क्या .... ?
सच औलादों ने इतने गिन-गिन कर जूते मारे कि सामंतवादी,शोषितों की नसीब का खूनी, तुगलक विजय प्रताप मुंह दिखाने लायक नहीं बचा ।
ऐसा औलादो ने क्या कर दिया नरेंद्र ?
भाग कर अन्तरजातीय ब्याह कर लिया |
डॉ नन्द लाल भारती
18.06. 2015

Tuesday, April 21, 2015

दहकता सवाल। लघुकथा

दहकता सवाल। लघुकथा 
क्या बात है सुबह-सुबह चिंता की बौझार समय पुत्र ?
चिंता नहीं बॉ साहब एक दहकता सवाल है। 
कैसा सवाल ?
डाक्टर को लेकर। 
आजकल के दुछ डाक्टर तो बकर कसाई होते जा रहे है। 
बा साहब मुददा  तो ये भी ज्वलंत है पर मेरा दहकता सवाल नाम के आगे डाक्टर लिखने को लेकर है। 
भाई सेवक चंद लिखने की जिसके पास योग्यता है उसे लिखना चाहिए। तुम भी लिखो तुम्हे हिंदी विद्या पीठ से  विद्यावाचस्पति और विद्यासागर की उपाधि मिल चुकी है  तुम सुपात्र हो अपने नाम के आगे विद्यावाचस्पति या  विद्यासागर या डाक्टर लिखो। 
बॉ साहब यही दहकता सवाल है, लोग दहकता सवाल करते  है कि  पी.एच.डी. कब किये। 
लोग उनसे सवाल  क्यों नहीं करते जो बिना किसी उपाधि के राष्ट्रपिता अथवा सत्ता पर पारिवारिक कब्ज़ा होने के कारण भारतरत्न हो गए बॉ साहब कहते-कहते हांफ गये ।   
सेवकचंद-बॉ साहेब आप तो  और बड़ा दहकता सवाल खड़ा कर दिये । 
डॉ नन्द लाल भारती 
21.04.2015    

Wednesday, February 11, 2015

दलित क्षत्रिय ,धर्मयोध्दा/लघुकथा

दलित क्षत्रिय ,धर्मयोध्दा/लघुकथा 
लो तरक्की आ गयी दासवंत  खैनी थूकते हुए बोला। 
कैसी तरक्की कर्मवन्त हुक्का दास्वन्त को थमाते  हुए बोला। 
क्या ये तरक्की कम  है ,अछूत दलितो  ,दलित क्षत्रिय ,धर्मयोध्दा कहा  जा रहे है। 
सब भ्रमजाल में फंसाकर  गुलाम बनाये रखने की साजिश है दासवंत। 
सिकुड़ती हुई दुनिया में हो सकता है दलितों के दिन भी अच्छे आ  जाये. 
सदियों से शोषितो  के साथ धोखा है। सोचो जिन लोगो ने रूढ़िवादी जातिवादी धर्म  लिए   हांडी  गले में   झाड़ू कमर में  बांधने को विवश किया ,आदमी को जानवर से बदतर बना   दिया।  उन्ही के वंशज दलित क्षत्रिय ,धर्मयोध्दा कह रहे है। क्या कभी रोटी बेटी  की बात किये  है या कोई धार्मिक  सामजिक स्तर पर उदहारण पेश  किये ।   नहीं  दासवंत  नहीं । यह दहन-दमन की कोई नई साजिश है । 
क्या रहे हो कर्मवन्त ?
सच कह रहा हूँ। 
क्या सच कह रहे हो ?
जातिवादी -नफरतवादी रूढ़िवादी  धर्म के  डूबते जहाज को बचने के  लिए अब धर्म के ठेकेदारो को    दलितक्षत्रिय ,धर्मयोध्दाओ   अर्थात अछूतों /दलितों का  आत्म बलिदान  चाहिए। डॉ नन्द लाल भारती 11  .02 .2015    

दूषित आँख /लघुकथा

दूषित आँख /लघुकथा 
हवलदार  आवेदन के साथ लगी नवयौवना के  फोटो को दूषित  आँखों से निहारते हुए बोला हेडसाहेब गुमशुदा का एक नया केस आ गया क्या ....... ?
आ तो गया है। 
जनाब जांच कहा तक पहुंची ....... ?
जांच क्या ....... ?
क्यों नहीं .... ?
क्या जांच। जाड़े  का मौसम शबाब पर है ,उतरते ही वापस आ जायेगी। 
देश की  रक्षा और  समाज की सुरक्षा की कसमे खाकर  दौलत और  अस्मिता पर अश्लील नजरे रखने वाले, देश और समाजद्रोहियो की बात सुनकर सच नारायण का कलेजा मुंह में आ गया वह छाती पर हाथ रखकर थाने से  बाहर चला गया। पुलिस वाले दूषित आँखों से निहारते रह गए। 
 डॉ नन्द लाल भारती
 23 दिसम्बर 2014 

बेटी के बाप दर्द /लघुकथा

बेटी के बाप दर्द /लघुकथा 
गौरव तुम भी ब्याह की डोर में बंध गए। वैवाहिक जीवन मुबारक हो यार. 
धन्यवाद दीपचंदभाई। 
ब्याह की ख़ुशी तुम्हारे चहरे पर झलक नहीं रही है। ब्याह से खुश हो ना भाई। दहेज़ में कमी रह गयी क्या ? इंजीनियर पत्नी मिली है। तुम्हारा कुल सुधर जाएगा। 
रंजीत -गौरव बेटी के बाप को निथार लिया होगा,छोड़ा नहीं होगा। 
गौरव-पापा ने लिया है मैंने नहीं। 
कितना ..... ?
दस लाख शायद- गौरव। 
समझ में आया। 
क्या दीपचंद … ?
काश तुम्हारे पापा बेटी के बाप का दर्द समझ पाते।दहेज़ का विरोध करने वाला बातो का जादूगर बिक गया । बालिका भ्रूण हत्या के दोषी तेरे पापा सौदागर है क्या ?
डॉ नन्द लाल भारती 11 .02 .2015