धुँआ ..
रामलाल-भईया कैसे है ? उनके फेफड़े की बीमारी आपरेशन के बाद फिर तो नहीं उभरी ना ?
तन्मय- उभर जायेगी ,फिर भगवान नही नहीं पचा पायेगे. दारु गंजे के जश्न में ऐसे ही डूबे रहे तो .
रामलाल- अपने बाप के बारे में ऐसा क्यों कह रहे हो बेटा ?
तन्मय- क्या कहू चाचा ? दो-दो आपरेशन हो गया पेट का , पर गांजा छुटता नहीं .बेटे -बहू पोते-पोती को तो पहले ही चिलम पर रखकर उड़ा चुके है . अब तो बेटी -दमाद ,नाती-नातिन को भी धुएं में उड़ा रहे है ,गांजे की मस्ती में .
रामलाल-क्या धुएं के सुख में ज़िन्दगी उड़ा रहे है भईया ? नन्दलाल भारती.. २८.०९.२०१०
Tuesday, September 28, 2010
Sunday, September 19, 2010
PARSAAD
परसाद ..
आओ बच्चो आरती कर लो . पूजा हो गयी .
चलो माँ बुला रही है .
आरती का समय हो गया क्या ..?
हां बनती,बबली चलो. माँ बुला रही है ना .
माँ-बाप के साथ बच्चो ने आरती किया. माँ ने बच्चो को चना -चिरौंजी का परसाद दिया. प्रसाद माथे चढ़ाकर मुंह में डालते हुए बनती बोला माँ आरती के बा परसाद जरुरी होता हा क्या..?
हां -पूजा का परसा जीवन के अच्छे संस्कार की तरह है बेटा .
बनती- माँ मै भी बाँटूगा ....नन्दलाल भारती ... १९.०९.२०१०
आओ बच्चो आरती कर लो . पूजा हो गयी .
चलो माँ बुला रही है .
आरती का समय हो गया क्या ..?
हां बनती,बबली चलो. माँ बुला रही है ना .
माँ-बाप के साथ बच्चो ने आरती किया. माँ ने बच्चो को चना -चिरौंजी का परसाद दिया. प्रसाद माथे चढ़ाकर मुंह में डालते हुए बनती बोला माँ आरती के बा परसाद जरुरी होता हा क्या..?
हां -पूजा का परसा जीवन के अच्छे संस्कार की तरह है बेटा .
बनती- माँ मै भी बाँटूगा ....नन्दलाल भारती ... १९.०९.२०१०
MAANG
मांग ..
यतन बाबू खुद काफी पढ़े लिखे सम्मानित व्यक्ति थे .उनकी बिटिया भी माँ-बाप का नाम रोशन कर रही थी . बेटी के ब्याह की चिंता उन्हें सताने लगी थी. सुयोग वर का पता लगते ही वे ऊँची उड़ान भरने वाली शिक्षा के साथ सामाजिक संस्कार में महारथ हासिल करने वाली बेटी की जन्म पत्री वर पक्ष की ओर भेजकर आश्वस्त हो गए. बेटी के हाथ जल्दी पीले करने के सपने बुनने लगे क्योंकि उनका मानना था की कोई भी सभ्य-संस्कारवान सामाजिक व्यक्ति बिटिया को ख़ुशी-ख़ुशी बहूरानी बनाने को तैयार हो जायेगा पर क्या भ्रम टूट तीसरे दिन इंकार हो गया.शायद बाप का ओहदा दहेज़ की मांग पूरी करने लायक नहीं था ...
. नन्दलाल भारती... १९.०९.२०१०
यतन बाबू खुद काफी पढ़े लिखे सम्मानित व्यक्ति थे .उनकी बिटिया भी माँ-बाप का नाम रोशन कर रही थी . बेटी के ब्याह की चिंता उन्हें सताने लगी थी. सुयोग वर का पता लगते ही वे ऊँची उड़ान भरने वाली शिक्षा के साथ सामाजिक संस्कार में महारथ हासिल करने वाली बेटी की जन्म पत्री वर पक्ष की ओर भेजकर आश्वस्त हो गए. बेटी के हाथ जल्दी पीले करने के सपने बुनने लगे क्योंकि उनका मानना था की कोई भी सभ्य-संस्कारवान सामाजिक व्यक्ति बिटिया को ख़ुशी-ख़ुशी बहूरानी बनाने को तैयार हो जायेगा पर क्या भ्रम टूट तीसरे दिन इंकार हो गया.शायद बाप का ओहदा दहेज़ की मांग पूरी करने लायक नहीं था ...
. नन्दलाल भारती... १९.०९.२०१०
DALAAL
दलाल ..
कहा जाना है साहब ? अवंतिका से जा रहे है क्या ? टिकट कन्फर्म है ?
क्यों पूछताछ कर रहे हो भाई ......
मुसीबत में ना फंसो इसलिए .
कैसी मुसीबत ?
देखिये इन साहब को अलाल से टिकट लिए है . ट्रेन आने के समय पता चला है की टिकट इटिंग में है . अपना टिकट देख लो साहब . दो सौ रुपये लगेगे कन्फर्म करवा दूंगा ..
मेरा कन्फर्म है .
कन्फर्म कैसे हो गया चार वेटिंग है . टिकट और दो सौर रूपया दो मै कन्फर्म टिकट लता हूँ.
भाग रहा या पुलिस बुलाऊ . इतना सुनते ही वह ठग भीड़ में गायब हो गया .....नन्दलाल भारती .. १९.०९.२०१०
कहा जाना है साहब ? अवंतिका से जा रहे है क्या ? टिकट कन्फर्म है ?
क्यों पूछताछ कर रहे हो भाई ......
मुसीबत में ना फंसो इसलिए .
कैसी मुसीबत ?
देखिये इन साहब को अलाल से टिकट लिए है . ट्रेन आने के समय पता चला है की टिकट इटिंग में है . अपना टिकट देख लो साहब . दो सौ रुपये लगेगे कन्फर्म करवा दूंगा ..
मेरा कन्फर्म है .
कन्फर्म कैसे हो गया चार वेटिंग है . टिकट और दो सौर रूपया दो मै कन्फर्म टिकट लता हूँ.
भाग रहा या पुलिस बुलाऊ . इतना सुनते ही वह ठग भीड़ में गायब हो गया .....नन्दलाल भारती .. १९.०९.२०१०
BHEEKH
भीख ..
एक रूपया दे दो जोज की भूख लगी है कहते हुए भिखारी ने हाथ फैला दिया .
पराठे खा लो भूख लगी है तो .
पराठे नहीं .
क्यों मै भी तो खा रहा हूँ.
एक रूपया दे दो ..
खुले नहीं है
कंजूस भीख नहीं दे सकते कहते हुए भिखारी बालक आगे चला गया .... नन्दलाल भारती ...१९.०९.२०१०
एक रूपया दे दो जोज की भूख लगी है कहते हुए भिखारी ने हाथ फैला दिया .
पराठे खा लो भूख लगी है तो .
पराठे नहीं .
क्यों मै भी तो खा रहा हूँ.
एक रूपया दे दो ..
खुले नहीं है
कंजूस भीख नहीं दे सकते कहते हुए भिखारी बालक आगे चला गया .... नन्दलाल भारती ...१९.०९.२०१०
FAISALA
फैसला ..
एक दिन श्रेष्ठता और योग्यता में विवाद हो गया . श्रेष्ठता के अभिमान की बिजली योग्यता के ऊपर गिरने लगी . योग्यता ने नम्रता पूर्वक कहा आग मत लगाओ आओ फैसले के लिए पञ्च-परमेश्वर के पास चले. आना-कानी के बाद आखिरकार श्रेष्ठता मान गयी .पंचो ने योग्यता को सर्वश्रेष्ठ माना . अंततः श्रेष्ठता ने योग्यता के महत्व को स्वीकार कर पश्चाताप करने लगी क्योंकि फैसला समझ में आ गया था . श्रेष्ठता को पश्चाताप की अग्नि में जलाते हुए देखकर योग्यता ने गले लगा लिया .....नन्दलाल भारती ..१९.०९.२०१०
एक दिन श्रेष्ठता और योग्यता में विवाद हो गया . श्रेष्ठता के अभिमान की बिजली योग्यता के ऊपर गिरने लगी . योग्यता ने नम्रता पूर्वक कहा आग मत लगाओ आओ फैसले के लिए पञ्च-परमेश्वर के पास चले. आना-कानी के बाद आखिरकार श्रेष्ठता मान गयी .पंचो ने योग्यता को सर्वश्रेष्ठ माना . अंततः श्रेष्ठता ने योग्यता के महत्व को स्वीकार कर पश्चाताप करने लगी क्योंकि फैसला समझ में आ गया था . श्रेष्ठता को पश्चाताप की अग्नि में जलाते हुए देखकर योग्यता ने गले लगा लिया .....नन्दलाल भारती ..१९.०९.२०१०
Saturday, September 18, 2010
BOOKH
भूख ..
देवकरन नशे की हालत में ठुसते जा रहे थे जो कुछ खाना था ,यान्ति परस चुकी थी . देवकरन खाने के बाद थाली चाटने लगा तो दयावंती से नहीं रहा गया वह बोली और रोटी बना दू क्या.....?
देवकरन -नहीं रे तू ये बर्तन रख और सो जा.......... लड़खड़ाते हुए देवकरन बोला और चारोखाना चित हो गया. कुछ देर के बाद कराहने लगा . बेचारी दयावंती हाथ पाँव दबाने लगी. हाथ पाँव दबाते ही खरार्ते मरने लगा. जब दयावंती के हाथ थम जाते तो वह कराहने लगता , बेचारी रात भर देवकरन की सेवासुश्र्खा में लगी रही. भोर हुई नशा तनिक उतारी तो वह दयावंती को उंघती देखकर बोला राजू की माँ रोटी खा ली .
दयावंती-तुमने खा लिया ना-----
देवकरन -मैंने तो खा लिया ..
दयान्ति-समझो मैंने भी खा लिया ....
देवकरन - मतलब--------
दयावंती - औरत हूँ ना बच गया तो खा लिया नहीं बचा तो नहीं खायी . औरत को भूख नहीं लगती ना...
इतना सुनते ही देवकरन की सारी नशा उतर गयी ..............नन्दलाल भारती....१८.०९.२०१०
देवकरन नशे की हालत में ठुसते जा रहे थे जो कुछ खाना था ,यान्ति परस चुकी थी . देवकरन खाने के बाद थाली चाटने लगा तो दयावंती से नहीं रहा गया वह बोली और रोटी बना दू क्या.....?
देवकरन -नहीं रे तू ये बर्तन रख और सो जा.......... लड़खड़ाते हुए देवकरन बोला और चारोखाना चित हो गया. कुछ देर के बाद कराहने लगा . बेचारी दयावंती हाथ पाँव दबाने लगी. हाथ पाँव दबाते ही खरार्ते मरने लगा. जब दयावंती के हाथ थम जाते तो वह कराहने लगता , बेचारी रात भर देवकरन की सेवासुश्र्खा में लगी रही. भोर हुई नशा तनिक उतारी तो वह दयावंती को उंघती देखकर बोला राजू की माँ रोटी खा ली .
दयावंती-तुमने खा लिया ना-----
देवकरन -मैंने तो खा लिया ..
दयान्ति-समझो मैंने भी खा लिया ....
देवकरन - मतलब--------
दयावंती - औरत हूँ ना बच गया तो खा लिया नहीं बचा तो नहीं खायी . औरत को भूख नहीं लगती ना...
इतना सुनते ही देवकरन की सारी नशा उतर गयी ..............नन्दलाल भारती....१८.०९.२०१०
Subscribe to:
Posts (Atom)